सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
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न कानोंसे सुना. इस कलियुगमें तुम कोई अवतार हो. एक जबानसे हमकहाँतलक तुम्हारी सिफत करसके ? एक शिर है हमारा हम तुझे क्या चढ़ावें? तुम्हारे पराक्रमपर करोड़ो शिर सदके हैं. जो नियत हमने कीथी सो तुमने पूरी कि; इसका भरोसा हमें न था कि यह इरादः हमारा पूरा होगा. राज्यकन्या हाथ जोड़कर राजासे कहने लगी-महाराज ! मेरा यह महा- दुःख आपने छुड़ाया. नहीं तो मेरे बाप ने ऐसा पाप किया था कि, आप तो नरक भोग करता और मैं सारी उमरभरही अन- ब्याही रहजाती. इतनी कथा कह पेमावती पुतली बोली की- सुन राजा भोज ? ऐसा पराक्रम करके उस कन्याको लाया और उस बिरहीको इसे देते बार न लाया. राजकन्या और सब माल असबाब बिरहीको दे दिया. और आप खाली हाथोंमे अपने मंदिरमें आ दाखिल हुआ और तू बिद्यार्थी है ऐसा साहस तुझसे न होसकेगा. यह सुनकर राजाने हैरान होकर शिर निचे कर लिया. वह साअतभी इसीतरह गुजरी. फिर दूसरे दिन राजा भोज जब सिंहासनके पास आया और चाहा कि बैठैं. तब पद्मावती --- ग्यारहवीं पुतली--- बोली-कि, हे राजा भोज ! पहले मुझसे कथा सुनले. पीछे