सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंग्यारहवीं पुतली ११. (७५) चली, तब राजाने वीरोंको आज्ञा की कि वह कहीं जाने न पावे. तब वीरोंने दौड़कर उसकी चोटी पकड खैंच लिया. और राजाके सामने लाकर हाजिर किया. राजाने उससे पूछा कि तू चंपकबरनी, मृगनयनी, पिकवयनी, गजगामिनी, कटिकेहरी, चंद्रमुखी, नख- शिखसे ऐसी कि, हँसीसे तेरी फूल झडते हैं और सुगंधसे भौंरे मँडराते हैं. बतला कि, देवके पेटमें क्योंकर रहीथी ? तब वह बोली-सुन राजा ? पहले मैं शिवगण थी. पर एक आज्ञा शिवजीकी मैं चूक गई तिससे उन्होंने मुझे शाप दिया. और मैं मोहिनीरूप होगई. और इस दैत्यने महादेवकी बहुत तपस्या की, तब सदाशिवने मेरे तई उसको बकसीस दिया. फिर उस पापीने मुझे लेकर अपने पेटमें भर रक्खा. तबसे मैं मोहिनी कहलाई पर शिवकी आज्ञा थी कि इसकी सेवा कीजियो. और जो यह कहें सो मानियो. यों इसके बश होकर मैं रहतीहूं. मेरा माजरा जो था सो मैंने आपसे कहा. अब ये वीर मुझे काबू कर तुम्हारे पास लाये हैं. और आदमीको इतनी कुदरत नहीं थी बल्कि जो तुमभी बहुतेरा उपाय करते तोभी तुम्हारे हाथ न आती. अब राजा ! मैं तुम्हारे बशमें हूं और मैं मोहनी हूं इसवास्ते तेरे पास रहूंगी. ज्यो महादेवके पास पार्वती यह कहकर बचन दिया. एक वह मोहिनी और दूसरी वह रंडी, जिसे देवसे छुड़ाया था वे दोनों राजाके साथ हुईं. ये बातें कह पद्मावती पुतली