सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ८४ ) सिंहासनबत्तीसी.
सदा दान पाते हैं उन्होंको उसी तरहसे दो. दीवान मुवाफिक हुकमके अपने काममें मशगूल हुआ. और राजा बीर विक्रमा- दित्यने कहा—महाराज ! मुझे आज्ञा दीजिये तो मैं अपने देशको जाऊं. बहुत दिन गुजरे हैं तब वह राजा बोला-हम तुम्हारे कहांलक गुण मानेंगे ? तुमने हमें जीवदान दिया है. फिर कहा—जो तुम अपने देश पहुँचोगे. तब संदेसा हमें भेज देना कि, हम क्षेम कुशलसे पहुँचे. और ठीक अपना ठिकाना बता जाओ, जो हमारा पत्र तुम्हारे पास पहुँचे. तब उसने कहा कि-हे राजा ! मैं राजा बीर विक्रमादित्य हूं,अंबा वती नगरीमें राज्य करता हूं. तुम्हारा नाम और यश सुनकर दर्शनके लिये आयाथा. सो तुम्हें देखा और मेरा चित्त प्रसन्न हुआ. तुम अच्छी तरहसे राज करो और हमें विदा दो. तुम्हारा साहस बल धर्म हमने देखा. यह सुनतेही वह राजा उसके पाँओंपर गिरपड़ा और हाथ जोड़कर कहने लगा कि— महाराज ! बड़ा अपराध हुआ . मैंने तुम्हारा मर्म न जाना. तुमने मेरी सेवा की सो तुम अपने जीमें कुछ न लाना. और जैसा धर्म मैंने आपका सुनाथा वैसा ही देखा. और धन्य हैं तुम्हारे तांई और तुम्हारे धर्म साहस और पराक्रमको. यह कह राजाको तिलक दे विदा किया. राजा बीरोंको—बुला सवार हो अपने नगरमें आया. इतनी बात कीर्तिवती पुतली