भारतकोश
सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

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लगाया गयाथा, यह तमाशा राजा देख बहुत प्रसन्न हुआ और ब्राह्मणको ऊपर बुलाया, वह जाकर सम्मुख हुआ तब राजाने दंडवत् किया और उसने आशीष दी. फिर शिष्टाचार कर गद्दीपर बिठाया, जैसे वस्त्र आभूषण आप पहने थे वैसेही मँगवाकर ब्राह्मणको पहनाये और कामकंदलाको बुलाकर आज्ञा की कि, यह महागुणी है इसलिये इसके आगे अपना गुण तू प्रकाश कर कि जिससे यह प्रसन्न होवे. कामकंदला राजाकी आज्ञा पाय अपना गुण जाहीर करने लगी. उसने संगीत नृत्यका आरंभ किया. रंगके सीसे भरे हुए सीसपर धर मुँहसे मोती पिरोती हुई हाथोंसे बले उछालती हुई और सब साज स्वर मिलाये हुई नाचती थी. इसमें फूलोंकी और अतरकी खुशबू पाकर एक भौंरा उडता हुआ आकार उसके कुचकी विटनीपर बैठा और डंक मारा, उसके बदनमें पीर हुई तब बिचारा कि, जो कुछभी हरकत करती हूं तो तालभंग होगा और मेरे गुणकी हँसी हो जायगी. इतना जीमें सोच भें- डार बिचारकर श्वास कुचकी राह निकाली. पवन लगतेही वह भौंरा उड़गया. तब माधव उस गुणको देखतेही मोहित होकर बोला कि,-हे सुंदरी ! धन्य है तुझे और तेरे करतबको. यह कहके प्रसन्न होकर वस्त्र और आभूषण जो राजाने दियेथे वह सब उतार उसको दिये यह देख राजा और मंत्री आपसमें