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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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( १६० ) सिंहासनबत्तीसी. नाव बनानेकी आज्ञा दी थी सो तैयार है. यह सुनतेही दीवान उठ नदीके किनारे आकर नावको देख प्रसन्न हो उस बढ़ईको घोडा जोडा दे पांच गांव वृत्ति कर दिये और दीवान अपना सामान नावपर रखवा आप कुटुंबसे बिदा हो हाथ जोडकर कहने लगा कि, जो हम जीते फिरेंगे तो फिर तुमसे मिलेंगे और जो मरगये तो यही बिदा हमारी है. यह कह कर रुखसत हुआ. तमाम घरके लोग कूक मार रोने लगे. फिर यह भी जी भारी किये हुये इस नावपर बैठा पाल बढा कि कीश्ती खोल जिस तरफसे वह फूल बहता हुआ आया उसी तरफको वह चला जाता था और दोनों किनारेके वृक्षोंको देखता जाताथा. कितनेक दिनोंमें चला चला एक महावनमें जा पहुँचा और खानेकी जिनसभी तमाम हो गई तब उसने अपने जीमें विचारा कि, अब नावपर बैठ रहना उचित नहीं जिस कामको आया हूं उस कामकी फिक्र किया चाहिये. यह सोचकर किसी पाल कर उडाये जाता था. कि एक पहाड दरमियान उस दरियाके नजर आया. और उसी पहाडसे पानी आता था. किश्ती वहीं लगा, आप उतर कर पहाडपर जाकर क्या देखता है कि जहां तहां हाथी गैंडे शेर अरने दौड रहे हैं सिवाय उनकी आवाजोंके और कोई बात कान नहीं पडती, सुन सुन आवाजें अपने जीमें सहमा जाता