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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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तेईसवीं पुतली २३. ( १५१

था, इस परभी आगेही पांव धरता था. जब उस पहाडको लांघ गया वहां जाकर देखे तो एक वैसाही फूल बहा हुआ चला आता है. उस फूलको देख जीमें ढाढ़स हुई और कहने लगा कि वैसा फूल दूसराभी देखा. भगवान् चाहे तो वृक्ष भी नजर आवेगा. ज्यों ज्यों आगे बढा त्यों त्यों फूल और भी बहते देखे वह अंदेशा करनेका कारण उसके जीमें कमती हुआ. और उसके मनमें कुछ करार आया, आगे देखता है कि एक बडा पहाड है और उसके नीचे एक मंदिर है. उस मंदिरको देखकर अपने मनमें विचारा कि, ऐसा सुंदर मंदिर उस जगह बना हुआ है चाहिये कोई मनुष्यभी होय. यह कहता हुआ उस मंदिरके पास जाकर पहुँचा, और वहां जाकर देखे तो एक तरुवरमें तपस्वी जंजीर पांवोंमें बांधे हुए उलटा लटक रहा है मांस, चाम सूखकर काठ हो गया है और उसमेंसे एक एक बूंद रक्तका उस नदीमें गिरता है, और फूल हो वहांसे चला जाता है. ऐसे अचरजको देख जीमें यों कहने लगा कि भगवानकी लीला कुछ बुद्धिमें नहीं आती. नीचे निगाह करके देखे तो बीस योगी वैसेही जटाधारी बैठे हैं और सूख के वेभी खडंग होरहे हैं और चारों तरफ उनके दंडकमंडलू पडे हुए हैं और जिस ज्ञान ध्यानमें जैसे बैठे थे वैसेही बैठे हैं. यह दशा वहांकी देख प्रधान उलटा फिर अपनी