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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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( १५२ ) सिंहासनबत्तीसी.

नावके पास आया. नावपर सवार हो कितनेक दिनोंमें अपने नगरमें आन पहुँचा लोगोंने खबर उसके आनेकी पा पेशवाई लेनेको गये और इसे ले आये. जो कोई आताथा सो मिलकर क्षेम कुशल पूंछ कर बधाई देता था घरमें भी उसके नौबत बजने लगी, मंगलाचार होने लगा. यह खबर राजाने सुनी और एक प्रधानको भेज दीवानको बुलाया. वह आनकर लेगया. यह जाकर राजाके पांवपर गिर पडा, रा- जाने उठा छातीस लगा क्षेम कुशल पूंछी और कहा. कहां तलक- तू गयाथा और कहां ठिकाणा उसका कर आया ! यह सुनतेही वे फूल जो लायेथे सो भेंट किये और हाथ जोडकर कहने लगा कि महाराज ! एक अचंभेकी बात है जो मैं कहूँगा तो आप न पतियायेंगे फिर राजाने कहा जो तूने अचंभा देखा है सो बयान कर । तब वह बोला महाराज मैं यहांसे चला हुआ एक जंगलमें पहुँचा और वहां जाकर एक पहाड़ देखा उस पहाड पर जब मैं चढा तो और एक पहाड नजरआया. इस तरहके पहाड लांघ जब मैं आगे गया, तब तक पहाडके तले एक सुंदर मंदिर देखा जब मैं उसके पास गया तो एक पेडपर तपस्वी पांवोंमें जंजीर बाँधे हुए उलटा लटकता हुआ. नजर पडा मांस चाम सब उसका हाडमें सट रहा है और रक्त उसकी देहसे जो टपकता है सो फूल बनकर बहता है और उसके नीचे