सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
by पारम्परिक / लल्लू जी लाल
Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)
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Read in contextतेईसवीं पुतली २३. (१५३) देखा तो बीस तपस्वी आसन मारे जिस ध्यानमे बैठे थे योंके योंही रहगये हैं और जान एकमेंभी नहीं. यह सुनकर राजा हँसा और मंत्रीसे बोला कि, तू सुन मैं उसका विचार तुझसे कहता हू कि वह जो तूने तपस्वी सांकलमें लटकता हुआ देखा वह तो मेरी देह है. मैने उस जन्ममें ऐसी कठिन तपस्या की थी कि उसका फल यह राज मुझे मिला है और जो वह बीस सिद्ध तूने देखे सो बीसों दास हैं कि, जो तूने ला दिये और उस तपस्याके तेजसे मेरे आगे कोई नहीं ठहर सकता. उसी बलसे मैंने शंखको मारा और यह पूर्वजन्मका लिखा था इसमें मेरा कुछ दोष नहीं. जबतक मैं इस पृथ्वीमें अखंड राज करूंगा तबतक तू मंत्री रहेगा. तू अपने जीमें चिंता मतकर. इसमें दोष तेरा भी कुछ नहीं. जैसा पूर्वजन्मका लिखा था सो हुआ और जैसी तब उन्होंने मेरी सेवा कीथी वैसाही अब उसके फलभोग करेंगे. तब उन्होंने मेरेसाथ जी दिया था उस लिये मै उन बीसोंको अपने निकट रक्खा है. यह अपना परिचय दिखानेके लिये तुझसे निठुराई की थी. अब तेरा मन पतियाया. और तूने हमारा मर्म बूझा. क्योंकि सब लोग कहते हैं विक्रमने अपने बड़े भाईको मारा इसमें दोष मेरा कुछ नहीं और जो कर्मका लिखा है सो हो रहता है. आजसे मैंने तुझे अपना प्रधान किया. और जिसमें राजकाज अच्छा होवे वह कीजो. यह बात किसीके आगे मत कहियो किसलिये कि, जो सुनेगा सो राजके लोभसे