सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
by पारम्परिक / लल्लू जी लाल
Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)
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( १५४ ) सिंहासनबत्तीसी. योग कमावेगा. इतनी बात कहणावती पुतली कहकर बोली कि, सुन राजा भोज ! जितना बीरविक्रमादित्यका राज था तिसका भार उसने दीवानको दे मुखत्यार करदिया, और राज पाट हवाले करदिया. जो इसके समान तू होगा तो इस सिंहासनपर बैठनेको नाम ले नहीं तो यह खयाल दिलसे दूर कर. वह साअत और वह दिनभी राजाका टल गया. दूसरे दिन सुबह आन फिर सिंहासनके पास खड़ा रहा. तब चित्रकला- चौबीसवीं पुतली- बोली सुन राजा भोज ! मैं एक दिनकी हकीकत राजा बीर विक्रमादित्यकी तेरे आगे कहती हूं, तू दिलमें अपने खूब तरह समझ. एक दिन राजा विक्रमादित्य नदीके किनारे दशहराको नहाने गया था. वहाँ जाकर देखे तो एक रंडी बनियेकी जवान खूब सूरत नदीके तीर खडी हुई बाल सुखाती है और सामने उसके साह- कारका बच्चा बैठा तिलक दे रहा है. आपसमें दोनोंकी सैन चल रहीथी. कभी तो यह स्त्री हाथ नचाय भौंहें मटकाय बाल सुखाती है और कभी शिरका अचला छातीसे सरका बदन दिखा फिर छिपाती है, कभी आरसी दिखा चूमकर छातीसे