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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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[header] सिंहासनबत्तीसी. ( १३ )

खिदमत लेली. वह लड़का वहांसे निकलकर धारापुरमें आया. अय राजा ! वहां सब तुम्हारे बुजुर्ग थे. उसे उन सबोंने माना, बड़ी आव भगत की. वहाका राजा तुम्हारा बाप था. कितनी मुद्दतके बाद उसने दगा करके उस राजाको मारडाला और आप वहांका राज लेकर उज्जैन नगरीमें आया और यहां आकर मरगया. शंख जो बडा बेटा क्षत्रियाके पेटका था सो वहां आकर वहांका राजा हुआ, राज करने लगा. और औ यह अहवाल है कि, एकरोज पंडितोंने आकर राजा शंखसे कहा कि, तेरा दुश्मन दुनियामें पैदा हुआ. यह बात पंडितोंके मुंहं सुनकर वह भौचक रहगया. ब्राह्मण कहने लगे-हम सब शास्त्र देखा है, उससे यही अहवाल निकलता है, कि, जो हमने तुझसे कहा. मगर एक बात और है कि हम उसे मुंहसे निकाल नहीं सकते. तब राजाने कहा-खैर, जो तुमने यह बात कही तो वहभी कहो ! तब उन्होंने कहा-हमारे विचारमें यह आता है कि, शंखको मार राजा विक्रम यह राज करे. यह बात सुनकर राजा हंसा और कहने लगा, ये पंडित बावले हैं, उन्हें कुछ ज्ञान नहीं. इसलिये ऐसी बात कहते हैं. यह बात अनसुनी कर राजा चुप रहा. पण्डित अपने दिलमें शरमिंदा हुए कि, हमारे शास्त्रको इसने झूठा जाना और हमको दिवाना ठहराया. जब कितने एक दिन इस बातपर गुजरे तब पण्डित अपने मकान-