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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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(१४) सिंहासनबत्तीसी.

नोंमें बैठकर नजूम देखने लगे. उनमेंसे एक पंडित बोला-मेरे विचारमें यह आता है कि, राजा विक्रम कहीं नजदीक आन पहुँचा है. तब दूसरा उनमेंसे बोला-यहाँके किसी जंगलमें है. और एक उनमेंसे कहने लगा, उस जंगलमें एक तालाबभी है, वहीं अखाड़ा करके रहा है. तब एक ब्राह्मण उनमेंसे उठ खड़ा हुआ और जंगलको चला. वहां जाकर क्या देखता है कि, एक तालाब उसी राजा विक्रम तपस्या करता है मट्टीका एक महादेव बनाकर उसकी पूजा करता है और दंडवत् कर रहा है यह देखकर पंडित उलटा आया और सब पंडितोंको साथ लेकर राजाके नेारा गया और राजासे कहने लगा कि, तुम हमारे शास्त्रको झूठ मानते थे पर अब हम देखके आये हैं. फलाने जंगलमें राजा विक्रमादित्य आन पहुँचा. राजा शंख उस रोज सुनकर चुप रहा. सुबहको उठा और उस बनमें जातेही छिपकर देखने लगा कि, वह क्या करता है जहां राजा वीर विक्रमादित्य बैठा था वहांसे वह उठा पर तालावमें नहाकर फिर अपने आसनपर आकर बैठा और उसी तरहसे महादेवकी पूजा करने लगा. ओर यह : राजाभी निकलकर वहां जाकर खड़ा हुआ. जब वह विक्रम : महादेवकी पूजा कर चुका तब उसी महादेवकी पिण्डीपर उसने : पेशाब किया. जितने लोग राजाके साथ आयेथे, वे सब कहने : लगे कि, इसकी बुद्धि मारी गई है, कि पूजेहुये देवपर इसने