सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
by पारम्परिक / लल्लू जी लाल
Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)
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Read in contextसिंहासनबत्तीसी. ( १५ ) थूता. तब एक पंडित उनमेंसे बोला कि, उठो महाराज! यह तुमने क्या किया ! तब वह बोला, कि हम जातिके ब्राह्मण हैं देवताको पूजें या मिट्टीको ! तब ब्राह्मणोंने कहा, राजा ! कुछ हम अच्छा नहीं देखते, क्योंकि तुम्हारी मत कुमत होगई. जब मरनेका दिन आदमीका नजदीक आताहै तो उसका मति मारी जाती है. तब राजा बोला, तुम दिवाने होगये हो और मुझेभी बावला बनाते हो, जो भगवानने लिखा है वही होवेगा उसको कोईभी मिटा नहीं सकता. तब पंडित आपसमें कहने लगे इस राजाने क्या अपना अकाज किया है ? तब राजा शंखने बिक्र- मको मारनेकी यह फिकिर की कि सात लकीर कोयलेरो जादूकी काढी और उनपर भुस फैला दिया जो जरा मालूम न हो. और उन लकीरोंका यह गुण था कि, जो उनके ऊपर पांव धरे सो बावला होजाय. और एक खीरा मँगाकर जादू किया और एक छुरी पढकर हाथमे रक्खा. उस छुरी खीरेका यह असर था कि जो उस छुरीसे खीरा काटे उसका शिर कट जाय. पंडितोने कहा-आप उ० बुलाओ. उन, लकीरोंपर पाव धरके जो आवेगा तो वह दिवाना हो जावेगा. बावला होकर यह खीरा जो अपने हाथसे लेकर काटेगा तो शिर उसका कट जायगा. जितने क्षत्रिय राजाके साथ आयेथे वे सब अपने दिलमें फिक्रमंद हुए कि, इस राजाने दगा किया है. यह क्षत्रियोंका धर्म नहीं.