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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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( १६६ ) सिंहासनबत्तीसी. जीमें सदा रख कि, दान हमेशा किया कीजिये यह भयरूप जो संसारसागर है इसके तरनेको सिवाय दान, उपकार और हरि- भजनके चौथा उपाय नहीं. मैंने तुझे कहा कि, साथ कोई कुछ ले नहीं जाता. मैं तेरे आगे सब कहतीहूं कि, राजा हरिश्चंद्र, राजा कर्ण, राजा बीरविक्रमादित्य क्या ले गये ! और जिन्होंने दान उपकार हरिभजन किया उनका जगमे नाम रहा और अंतसमय बैकुंठ पाया. ये बाते पुतलीकी सुन राजा भोज बोला कि, राजा विक्रमादित्यने क्या किया है ! वह कह. तब विद्यामती पुतली बो- ली कि, एक दिन राजा बीरविक्रमादित्य राजसभामें बैठा था तब एक दासीने आकर अरज किया कि, महाराज ! उठिये पूजाका समय जाता है. यह सुनकर राजाने विचार कि, इसने सच कहा मेरी उमर चली जाती है और मुझसे ज्ञान, धर्म, पूजा बन नहीं आई इससे उत्तम यही है कि, इस राजकाजकी माया भुलाय आप योग कमाइये जो कि और जन्ममें काम आवे. यह राजाने अपने जीमें विचार और राजपाट, धन जन मिथ्या समझकर तपश्या करनेको एक बनको चला ओर यह विचार करता जाताथा कि, इस संसारमें जीना सबेरेकी ओसकी समान है और जिसके भरोसेमें मैंने अपना काम अकारण गवाँया. यह विचार करता हुआ पूर्वजन्ममें दान, व्रत, तपश्या बहुत कर आता है तो यह नर- हुआ राजा एक महाबनमें जा पहुँचा वहां जाकर देखे तो