सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
by पारम्परिक / लल्लू जी लाल
Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)
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Read in contextछब्बीसवीं पुतली २६. (१६७) एक मंडली तपस्वियोंकी बैठी हुई है. धुनी एक एकके आगे जागे रही है, आसन मारमार अपने अपने ध्यानमें लीन हो रहे हैं. कोई ऊर्ध्वबाहु, कोई कपाली आसन मार, कोई पचाग्नि, इस रीतिसे अनेक अनेक प्रकारकी साधना कर रहे हैं और कोई कोई उनमें बैठ शरीरसे मास काट काट होम कर रहा है. इस तरहसे उनकी तपस्या देख राजाभी तपस्या करने लगा. आपभी तपश्या कर- ताथा और कईएक दिनमें तपस्वियोंने अपना शरीर होमने लगा- कर दिया. उनकी देखादेखी राजाभी अपना शरीर सब होम कई महीनोमें राजाने एक दिन शिरभी अपना काट होम कर- दिया. वहां जो एक शिवका मंदिर था उसमेंसे एक शिवगण निकला और निकलकर सब तपस्वियोंकी धुनीमेंसे राख समेट कर जुदी जुदी ढेरी की और फिर जा शिवको खबर दी कि, महाराज ! आपने कहाथा सो मैंने किया तब शिवने आज्ञा दी कि, यह अमृत तू लेजा और उनके ऊपर छिड़क आ. यह आज्ञा पाय अमृत ला ज्यों ज्यों छिड़कताथा त्यों त्यों उनमें एक २ आदमी शिव शिव रामराम कहकर खडा रहताथा. सब पर तो उसने छिडक दिया पर राजाकी धुनी भूल गया और सब तपस्वी मिलकर शिवकी स्तुति करने लगे कि, महाराज ! आपका भक्त राजाभी है आप अनाथके नाथ हो जिसने आपका स्मरण किया तिसको तभी तुमने फल दिया और जहां जहां सेवकोंक