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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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जगह मैं बताऊं, तब उन चोरोंने राजासे कहा कि, चल तू आगे हम तेरे पीछे हैं. जहां दौलत गड़ी होय सो हमें बता दे. इस तरह बातें कर आगे राजा पीछे चोर चले हुए राजमह- लके पीछे बगीचेमें आये. और जिस जगह दौलत राजाकी गड़ी हुई थी सो उन चोरोंको राजाने बतादी. और उन्होंने वहां खोदा तो एक तहखानेका दरवाजा निकला. उसे तोड़- कर अंदर जो देखे तो करोडोंका जबाहिर और अशरफियां रुपये भरे हैं. तब वह ले पोठे बांध शिरपर धर चले. इतनेमें एक गदिड़ बोला तब उनमें जो जानवरोंकी भाषा जानता था वह सुनकर समझ गया. और औरोंसे बोला कि, भाई ! यह गदड़ बोलता है कि, इस धनके लेनमें कुछ कुशल नहीं. उनमेंसे एक बोला कि, अपना शकुन तू रहने दे. पाई हुई लक्ष्मी तो हम नहीं छोड़ते; छोड़ें तो हमारे धर्ममें बट्टा आवै. तब उनमेंसे दूसरा बोला कि, उठो भाई, धन रत्न तो पाये पर वस्त्र नहीं मिले इससे कहीं चलकर वहांसे वस्त्र लीजिये. तो फिर चोरीका नामभी न लीजिये. फिर उनमेंसे एक बोला राजाका धोबी यहां रहता है उसके घरमें चलकर सेंध दें तो वहां हथहां तरहके अच्छे अच्छे कपड़े मिल जावेंगे. यह मनसुबा करि धोबीके पिछवाड़े तो वे गठड़िया रखदीं और जाकर बक्रमा- घरमें कुन्द लगा दी. इतनेमें उसका गधा देखकर बोल उठा बहुतसे देखनेके