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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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तीसवीं पुतली ३० (१८९)

कि, वह अपना हिस्साभी नहीं ले गया. ये अपने जीमे विचारते थे तब राजाने मुसकुरायके कहा तुम क्या मुँह देख देख अपने जीमें मेरा सोचते हो ? खैर तुम्हारी इसीसे है कि, माल जहां तुमने रक्खा है वहांसे जल्दी लादो. तब चोर बोले-महाराज ! बडे अचंभेमें हम पडगये हैं, कि एक चोर रातको हमारे साथ चोरी करनेमें शरीक था, और जबतक हमने चोरी की तबतक हमारे साथ वह था, और अपना भाग लेनेके वक्त हममेंसे य भाग गया. तब राजाने कहा अच्छा उस चोरकोभी अभी बता दो. तब इतनेमे एक चोर बोला कि, महाराज ! जी चाहे तो आप हमें मार डालो और चाहे तो छोड दो पर आपके रूबरू हम सच कहते हैं कि इस बखत तुम तो राजा हो और रातको हमारे साथ आपही थे क्योंकि हमने बहुतोंके साथ चोरिय- तो की हैं पर ऐसा किसीको न देखा कि, जो अपना बां- छोड दे. इस लिये हम धर्ममे कहते हैं कि, हमारे साथ आप थे, यह सुन राजा हँसकर बोला कि, तुम अपने जीमें मत ड हमने तो तुम्हारी जान बकशीश की. पर एक बात हम तु कहते हैं सो आजसे तुमको करनी पडेगी. तुम अब इ करनेसे हाथ उठाओ और बल्कि और दौलत जो तुम्हें च सो मेरे खजानेसे तुम ले जाओ. यह सुनकर चोरोंने रा बात कबूल की. राजाने उन्हें औरभी मुँह मांगी दौल

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