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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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इकतीसवीं पुतली ३१. ( १८९

गमें राजा बीर विक्रमादित्य बडा दाता और साहसी होगा उसका जब तू जाकर दर्शन करेगा तब तेरी इस देहसे मुक्ति होगी. इस लिये मैं तेरे दर्शनको आया हूं. राजाने उस हिर- नकी ऐसी बात सुनकर हँसा और उस हिरनने उसी समयही अपने शरीरका त्याग किया. राजाने उस हिरनको जलाकर गंगामें वहा दिया. और बहुतसे उसके नाम यज्ञ किये. इतनी बात कह पुतली बोली सुन राजा भोज ! ब उसके बराबर न्यौंवर हो सकता हैं. और तू अपने जीसे यह बात दूरकर और इस सिंहासनको लेकर अभी तुर्त गढवा दे जहांसे लाया हैं वहां पहुचा दे. इतनी बात पुतलीकी सुन राजा भोज अपने जीमें सोचने लगा और जबाब कुछ बन न आया और निपट निराश हो अपने मंदिरमें आया. वह दिन इस तरह गुजर गया और राजा अपने मकानमें आ रात तो उसी चिंतामें बिताई. सवेरे हुए मनमें वैराग्य लिया और सब काम तुछ मानकर फिर उस जगह जा उस सिंहासनके पास खडा हुआ और चढनेको पांव उठाया तब भानुमती--