सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
by पारम्परिक / लल्लू जी लाल
Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)
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Read in context( १९० ) सिंहासनबत्तीसी.
बत्तीसवीं पुतली-
बोली -सुन राजा भोज एक कथा मेरी सुन और अंत कथा तुझसे बुझाकर कहताहूं सो तू अपना मन लगाकर सुन कि, जब मय राजा बीर विक्रमादित्यका आया तब विमानपर बैठे इंद्रलोकको गया और अंबावती नगरीमें शोक हुआ तीनों लोकोंमें हंगामा मचा कि, राजा बीर विक्रमादि- काल होकर वह सदेहस्वर्ग गया. इसवक्त आ- और फोयका ये दोनो बीरभी राजाहीके साथ लोप हो न वह स्वामी रहा न ये दास रहे. संसारमेंसे धर्मकी उखड गई और सब रैयत राजाके राजकी कूक मार रोने लगी. ब्राह्मण भाट, भिखारी, राँड दुःखी सब हाय मारके रोने लगे कि, हमारा आदर करनेवाला और मान रखनेवाला राजा जगत्मेंसे उठ गया. रानियां तो राजाके साथ सती हुईं और जितने दास दासी थे सो सब अनाथ हो गये और जितने लोग नौकर, चाकर, सिपाही, शागिर्द पेश थे सो सब रोते थे और कहते थे कि, हाय ! हममेंसे कोई काम न आया इसी तरह महा खलबली राजके राज भरमें हो रहीथी. मंत्रीने राजकुँवर जैतपालको राजतिलक दे गद्दीपर बिठाया और तमाम मुल्कोंमें राजा जैतपालके नामका ढंढोरा फेर दिया. जब जैतपाल राजा हुआ तब वह एक दिन इस सिंहासनपर