सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
by पारम्परिक / लल्लू जी लाल
Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)
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Read in contextपहली पुतली १. ( १९ )
विक्रमादित्यके पास चलो तो हम सबोंकी जान बचे तब लूतबरन बोला-धन्य भाग जो तुम मेरे पास अपना मतलब समझकर आयेहो. जो कुछ काम मुझसे होगा उसके लिये मैं कभी ना न करूंगा. यह कहकर अपने राजाके पास आया और राजासे हुक्म लेकर उनके साथ गया. जब सब कौवोंने उस दीवानको देखा तब वे राजासे कहने लगे कि-महाराज ! आप जिसका नाम लेतेथे वह यही आता है. राजाने देखकर उसे आदर करके आधी गद्दीपर बिठाया और क्षेम कुशल पूंछी. वो आसीस देकर बोला राजा ! किसलिये तुमने मुझे याद किया ! और किसवास्ते इन सबको बंद किया ! जब लूतबरनने यह बात पूछी तब राजा विक्रम कहने लगां-मैं एकदिन शिकारको गयाथा. इत्तिफाकन जंगलमें राह भूलगया तब एक बरगदपर चढकर चारों तरफ देखने लगा इतनेमें एक कौवेने मुझपर बीट करदी. इसलिये मैंने सब कौवोंको बंद किया. जबतक इन- मेंसे कोई सच न कहेगा तबतक एक कौवा इनमेंसे न छोडूंगा. बल्कि जानसे इन सबको मारूंगा. फिर लूतबरन बोला-महाराज ! यह काम सब मेरा है. जब तुम्हें मैंने मगरूर देखा तब मेरे मनमें गुस्सा आया, और अकल मेरी उसवक्त जाती रही. यह सुनकर राजा हँसा. और बिगड़कर कहने लगा. मुझे मगरूर क्यों न हो ? राजा मैं हूं, दाता मैं हूं, सिपाही