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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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[header] ( २० ) सिंहासनबत्तीसी. मैं हूं. और कौनसी बात मुझमें नहीं है? सो तुम कहो, तब वह बोला-वह जो नगर तुमने नजर भरके देखा है उसका में सब बयान करताहूं. राजा बाहुबल नाम वहांका कदीम राजा है. और गंधर्वसेन बाप तुम्हारा उसका दीवान था. राजाको उसकी तरफसे कुछ बेइतबारी हुई तब उसे छुड़ादिया. वह नगर अंबावतीमें आया और उस जगहका राजा हुआ. उसका बेटा तूं विक्रम है. तुझे जगमें कौन नहीं जानता? पर जबतक राजा बाहुबल तुझे राजतिलक न देगा तबतक तेरा राज अचल न होगा और वह जो यह तेरी ख़बर पावेगा तब वही तेरेपर चढ़कर दौड़ेगा और तुझे आकर एक घड़ीमें राखके बराबर करदेगा इस वास्ते तुझे जो मैं सलाह दूंगा उसे मान और किसी तरहसे उस राजाके पास जाकर राजाको मोहबत दिलाकर तिलक उससे ले, जिससे यहांका अचल राज तू करे. राजा विक्रम बड़ा अकलमंद था, इसवास्ते इस बातपर कायम रहा ऐसी बातें लतबरनसे सुनकर कुछ दिलमें न लाया और हँसकर कानदे सब सुनी. फिर लतबरनने कहा-जो तुम्हें चलना हो तो हमारे साथ चलो और पंडितोंसों अच्छी साअत दिखाकर चलनेकी तैयारी करो. दूसरे दिन सुबहके वक्त राजा लतबरन मंत्रीके साथ होकर चला और राजा बाहुबलके नगरमें जाकर पहुंचा तब उस दीवानने राजा विक्रमसों