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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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दूसरी पुतली २. ( २७ )

राजाके पास चलागया. जब राजाके द्वारपर पहुँचा तब द्वार- पालसे कहा कि, राजाको खबर दो कि ब्राह्मण आपके लिए एक फल लाया है. दरवानने राजासे जाकर अर्ज की, कि महाराज ! एक ब्राह्मण फल आपके वास्ते लाया है और दरवाजेपर हाजिर हैं. जो कुछ हुक्म हो राजाने उसीवखत हुक्म किया कि उसे अभी लाओ. तब हरकारेने वहीं हाजिर किया. ब्राह्म- णने राजाको आकर आसीस दी कि, धर्मलाभ हो और यह फल राजाके हाथ दिया. राजाने उसको हाथमें लेकर पूँछा इसका सब वृत्तांत कहो ? तब ब्राह्मण कहने लगा-स्वामी ! मैने जो तपस्या की थी सो देखकर देवताओने उसका बर अमर- फल मुझको दिया. अब मै अमर होकर क्या करूँगा ? इस वास्ते इस फलको तुम खाओ और अमर हो; क्योंकि तुमसे लाखो जी जीते हैं. यह सुनकर राजा हँसा. और उसे लाख रुपये दिये और गांव वृत्ति करके बिदा कर दिया. फिर अपने जीमें विचार करने लगा कि, मैं तो पुरुष हूँ कमजोर न हूँगा. इसवास्ते यह फल रानीको दिया चाहिये, कारण वह मेरे प्राणका आधार है. वह जीती रहेगी तो मैं सुखभोग करूँगा. यह दिलमें ठानकर राजा महलमें दाखिल हुआ. फल रानीको दिखाया. रानी हँसकर पूँछने लगी. महाराज ! यह क्या चीज है ? जिसे बडे यत्नसे लिये हुये तुम यहा आये हो ? इसका ब्योरा कहो ? तब राजाने कहा-सुन सुंदरी ! तू जो इस फलको खायगी तो