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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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( २८ ) सिंहासनबत्तीसी. सदा यौवनवती रहेगी. दिनादिन रूप बढ़ेगा और अमर होगी. यह अहवाल रानीने सुनकर फल राजाके हाथसे लेलिया. और कहा-महाराज ! मैं इसे खाऊंगी. राजा फल देकर बाहर गया. और रानीका जो एक मित्र कोतवाल था, रानीने उसे बुलाकर इसके हाथमें वह फल दिया और उसे कहा-यह हमें राजाने देकर कहा है, जो इसे खावेगा सो अमर होगा. इसवास्ते तुम मेरे दोस्त प्यारे हो, इसे खाओ और अमर हो; तो मुझे बडी खुशी हो. यह सुनतेही कोतवालने खुश होकर फल हाथमें लेलि- या और अपने मकानको गया एक कसबी उसकी आश्ना थी उसे वह फल देकर कहा यह अमरफल मैं तेरे वास्ते लायाहूं. तू इसे खा. यह सुनकर उसने हाथसे लेलिया, और उसे बिदा किया. फिर इसने अपने जीमें बिचारा कि, एक तो मैं कसबी हूँ, और अमर हूंगी तो कितना पाप मैं कमाऊंगी. इससे बेहतर है कि, यह फल राजाको जाकर दीजिये. जो राजा जियेगा तो मुझे याद करेगा. और पुण्य होवेगा, पाप सभी कटेंगे. यह मनमें सोचकर राजाके दरबारमें गई और वह फल राजाके हाथमें दिया. राजा फलको देखकर बेसुध हुआ, और अपने जीमें कहने लगा कि यह फल तो मैंने रानीको दियाथा. जीमें यह विचार अचंभा होरहा, और हँसकर उसे पूछने लगा कि, यह फल तुझे किसने दियाथा ? वह वे सब बातें जानतीथी, पर राजासे फकत यह

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