सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
by पारम्परिक / लल्लू जी लाल
Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)
Page 36 of 190
Read in context[Page Header] दूसरी पुतली २. ( ३३ )
एक योगी आया. ओर राजाकी आदेश सुनाया. एक फल उसके हाथ दिया. उसने हँसकर वह फल हाथमें लिया. योगीने कहा- राजा ! हमारे यहां यज्ञ होता है. एक दिनका तुम्हारा न्योता है. तब राजाने कहा हम आवेंगे. तुम अपने मनमें चिंता मत करो. सांझ हुए. पहुँचेंगे. योगी यह सुनतेही ठिकाना बताकर अपनी मठीको गया जब सांझ हुई राजाभी खांडा फरसी ले तयार हुआ. और किसीसे न कहा. अकेला चलागया तुर्त योगीके पास पहुँचा. और आदेश कहा. योगी बोला कि-देवीके आगे जाकर दंडवत् कर, तो देवी तुझपर दया करे. राजा बोला- स्वामी ! मैं तो दंडवत् करना नहीं जानता कि, किसतरह करते हैं ? इसवास्ते आप मुझे बताओ तो मैं करूं. योगी बताने लगा, ज्योंही शिर झुकाया, राजाने देवकी नसीहत याद करके एक खांडा ऐसा मारा कि, शिर धड़से जुदा होगया. और उसे मारके खतराज किया और उस वृक्षसे तेलीको भी उतार दोनोंको तेलके कटाहमें डालदिया. तब देवी बोली-धन्य है विक्रम तेरे साहसको. मैं तुझसे प्रसन्न हूं. तू मुझसे चाहे सो वर मांग और धन्य है तेरे माता पिताको, जिनके घरमें तूने अवतार लिया. देवी जब यह कह चुकी तब वे बीर आकर हाजिर हुए और राजासे कहने लगे कि, हम आगिया और कोयला दो बीर तुम्हारी सेवाके लिये आये हैं जो तुम्हारी कामना हो सो हमसे कहो हम ३