सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
by पारम्परिक / लल्लू जी लाल
Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)
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( ३४ ) सिंहासनबत्तीसी. तुरंत पूरी करदें. सब जगह जानेकी हम सामर्थ्य रखते हैं. जल, थल, मही, आकाशमें पवनके रूप होकर जहां कहोगे वहां हम चले जावें. जैसे हनुमान तुरंत लंका पहुंचा वैसे हमभी जा सकते हैं. यह सुन खुश हो राजाने कहा--मुझे तो कुछ काम नहीं है. अगर मेरे ताईं बचन दो तो मैं देवीसे तुम्हे मांगलूूं. लेकिन ऐ वीरो ! जो तुमसे बचन देकर निर्वाह किया जाय तो बचन दो. तब उन बैतालोंने कहा कि--अच्छा. तब राजाने उनको बचनबद्ध कर मांगलिया. और कहा-जिस जगह मैं याद करूं तुम उस जगह मेरेपास पहुँचना. तब वीर बोले कि-राजा ! तुम जिस जगहमें हमें याद करोगे, वहां हम पवनरूप होकर पहुँचेंगे .वह बात उनसे कहके राजा घरको गया. ये बातें चित्ररेखा पुतलीने राजासे कहीं कि, राजा ! विक्रमें ये काम थे. इतने योग्य तू नहीं है. फिर वे वीर राजाके साथ हुए और आगे बहुतसे काम किये. जहां विक्रमके गाढ़ पड़ा तहां ये दोनों आकर हाजिर हुए. जो कोई ऐसा काम करे तो सिद्ध हो. राजा ! तू अपने जोरपर गरूर मत कर. तुझ जैसे पृथिवीमें करोडो होगये हैं. इतनी बात जब पुतलीने कही तब राजाकी बहभी साअत टलगई. तब दूसरे दिन सुबहको राजाने फिर पाट बैठनेकी तैयारी की, ओर चाहा कि, सिंहासनपर पाँव धरौं, तब सत्यभामा नाम--