सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
by पारम्परिक / लल्लू जी लाल
Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)
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Read in context( ३८ ) सिंहासनबत्तीसी मनातेथे. जब लय आती थी, खुश हो हो बनातेथे, कही उसमें काम सोनेका और कही रूपेका ओर कही लोहेका और कहीं काठका, नई नई तरहसे बनताथा. चुनांचे दरयाके किनारेपर वह हवेली बनाई चार दरवाजे और सात खण्ड उसमें रक्खे. और जगह जगह जवाहिर अनमोलके उसमें जड़े और दरवाजेपर दो नीलमके बडे नगीने लगाये कि, किसीकी नजर न लगे, वह जडाउ महल कितनेक बरसोंमें ऐसा तैयार हुआ कि, दुनियाँके परदेपर कीसीने दूसरा न आँखोंसे देखा और न कानोंसे सुना तब दीवानने जाकर राजाको खबर दी कि, महाराज ! आपके हुक्म मुआफिक मंदिर तैयार होगया है. आप चलकर उसे देखिये. जो कोई उस महलको देखताथा सो मोहित हो रहताथा. ऐसा सुन राजा वहांरो मकान देखनेको गया. एकबार राजाके साथ एक ब्राह्मणभी गया. महलको जब राजाने मुलाजहा किया तब ब्राह्मण देखकर और हँसकर कहने लगा-ऐ राजा ! ऐसा घर जो मैं पाऊं, तो बैठ यहां सुखसे समय विताऊं. यह बात सुनकर राजाने कुछ मनमें साच न कि- या. गंगाजल और तुलसीदल लेकर वह घर उस ब्राह्मणको संकल्प कर दिया. यह घर पाकर ब्राह्मणको ऐसा आनंद हुआ कि, जैसे चकोर रातको चन्द्र पाता है, तुर्त वह अपने कुटुंबको ले आया और वहां आकर आनंदसे रहा. और रातको खुशीसे पलंगपर सोताथा कि, पहर रात गये लक्ष्मी वहां आई और कहने लगी-