सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
by पारम्परिक / लल्लू जी लाल
Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)
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Read in contextचौथी पुतली ४. ( ३९ )
बेटा ! हुक्म दे तो मैं गिरू और घर बाहर संपूर्ण भरूं. खौफसे उसने कुछ जवाब न दिया तब वह दोपहर रातको फिर गई ओर कहा कि, ऐ ब्राह्मण ! अज्ञानी ! मुझे आज्ञा दे. उन्होंने चिंता करके रात गंवाई और सुबह हुए राजा वीर विक्रमादित्यके पास आया. मन मलीन और रातके अहवालमे डरा हुवा रंग जर्द चिहेरेका ओर डरसे कुम्हलाया हुआ इस शक्लसे देख राजा उसे हँसने लगा. फिर कहने लगा कि, कलकीसी खुशी हमने आज न देखी, ऐ ब्राह्मण ! यह अचंभेकी बात है. तब ब्राह्मण बोला कि-सुन स्वामी ! मेरे दुःखके तुम दाता हो, प्रजाके सुख देनेवाले और तुम शकबंधी नरेश हो. जैसे राजा कर्ण और इंद्र अपने समयमें दानी थे वैसेही इस समयमें तुम हो. आपने जो मंदिर मेरे तई दिया है उसकी हकीकत में कहताहूं. मालूम नहीं कि, इस मंदिरमें भूत है ! या पिशाच ! मेरे तई उसने सारी रात सोने नहीं दिया. आपकी कृपासे और इन लडकोंके भाग्यसे जीता बचा. इसवास्ते अब मैं यहां आया हूं. इससे भीख मांगना मुझे बेहतर है. पर उस महलमें न रहूंगा यह बात सुन राजाने प्रधानको बुलाया और ऐसा कहा कि, जो इन मकानमें लगा है, सो हिसाब करके इस ब्राह्मणको दो. राजाकी आज्ञा पाय दीवा- नने हिसाब कर तोड़े रुपयोंके लदवाकर ब्राह्मणके साथ कर दिये और वह अपने घरको गया. एक दिन साअत देख उस