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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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( ४० ) सिंहासनबत्तीसी. हवेलीमें राजा जाकर रहा और बैठकर कुछ विचार करने लगा, इतनेमें हाथ बाँधकर लक्ष्मी आन खडी हुई और बोली कि-धन्य राजा विक्रम ! तेरे धर्मको. इतना कहकर लक्ष्मी उस वख्त तो चली गई और राजाने तो वहां आराम किया. जब पहर रात रही तब लक्ष्मी फिर आई और कहने लगी कि, राजा ! अब मैं कहां गिरूं ? राजाने कहा-जो तू पड़ा चाहती हो तो पलंग छों- डके जहां तेरी इच्छा हो तहां गिर इतनेमें खूब तरहसे सोनेका मेह तमाम नगरमें बरसा. सुबह हुबा तब राजा उठा और देख कर कहने लगा-हमारी रैयतपर बहुत सीखथी, लेकिन अब कोई दिन निश्चित हो आरामसे रहेगी इतनेमें दीवान आया. और खबर दी कि, महाराज ! तमाम नगरम कंचनकी वृष्टि हो गई है इसवास्ते अब जो हुक्म आप करोगे वैसा हम करें. तब राजाने कहा कि-तमाम नगरमें ढोल बजवादो कि जिसकी हद्दमें जितनी दौलत है सो उसे ले. और कोई किसीको मना न करे. यह राजाका हुक्म पाकर सब दौलत रय्यतने अपने २ घरमें भरी यह बात कहकर चंद्रकला पुतली बोली कि- राजा भोज ! सुन राजाविक्रमके गुण. वह ऐसा राजा था और प्रजाका हितकारी, इससे तू किस तरह उसके सिंहासनपर बैठता हे ? तेरी क्या जान है ? यह पुतलीकी बात सुनकर राजा भोज अज्ञान होगया. और वररुचि पुरोहितभी शरमिंदा हुआ.

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