सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
by पारम्परिक / लल्लू जी लाल
Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)
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Read in contextपाँचवी पुतली ५. ( ४१ ) वह साअत भी गुजरगई. दूसरे दिन राजा फिर सिंहासनपर बैठने चला. और मनमें चाहा कि, पांव सिंहासनपर धरै, तब लीलावती नामक— पाँचवीं पुतली- बोली-सुन राजा विक्रमके गुण, एक दिन दो पुरुष आप- समें झगडने लगे, एकने कहा-कर्म बड़ा और दूसरेंने कहा बल बड़ा. किस्मतका तरफदार बोला नशीब बड़ा है कि, अदनाको आला कर देता है और जोरका जानिबदार कहने लगा-जोर बड़ा है जोरावर होवे तो तमाम जहानको ज़ेर कर दे. इस तरह दोनों झगडते २ राजा इंद्रके पास गये और हाथ जोडकर कहने लगे-स्वामी ! आप हमारा न्याय करो जो दोनोंमें सच हो उसे फरमाइये. और झगडा निबेडिये. तब राजा इंद्र बोला--इसका न्याय हमसे न होगा. इस इन्साफको वह करेगा, जिसने योग किया होगा. इससे बेहतर यह है कि, तुम मर्त्यलोकमें राजा विक्रमादित्यके पास जाओ, इस न्यायको वह चुकावेगा उन्होंने राजा इंद्रकी आज्ञा पाय राजा विक्रमादि- त्यके पास जाकर अपना अरज किया और कहा कि-हम तीनों भुवनमें फिर आये पर किसीने हमारा न्याय नहीं चुकाया इसका धर्म अधर्म विचारके आप हमारा न्याय करो. यह बात सुन जाने कहा कि, आज तुम अपने अपने घरको जाओ. और छः