BharatKosha
सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

Page 45 of 190

Read in context
Page 45

( ४२ ) सिंहासनबत्तीसी.

महीनेके बाद हमारे पास आओ. तब हम तुमको इसका जवाब देंगे. यह सुनकर वे दोनों अपने घर गये राजा अपने मनमें चिंता कर बस्तर पहन काछा चढा खांडा फरी ले बिदेश चला और अपने दिलमें यह आहद किया कि, जबतलक इसका भेद न पायेंगे, तबतलक देशमें फिर न आयेंगे तब फिरते फिरते समु- द्रके किनारे जा पहुँचा. तब वहां एक नगर उसने बहुत बड़ा निपट सुहावना खूब आबाद पाया. और उसमें तरह तरहकी हवे- लियां जिनमें करोड़ों रुपये लगे थे और उनसे सिवाय जवा हिरके कुछ नजर न आताथा. वह देखकर राजा कहने लगा कि, जिसका यह नगर है, वह राजा कैसा होगा ? शहरमें फि- रते फिरते शाम होगई और शहर अखीर न हुआ. इतनेमें क्या देखता है कि, एक दूकानमें महाजन शिर निहुड़ाये हुए बैठा है. तब राजा उसीके सामने जा खडा हुआ. तब सेठने राजासे कहा तू किस देशसे आया है? और तेरा मन मलीन क्यों हो गया है ? किसे ढूंढता है ? और क्या तेरा काम है ? यह सब अपना अर्थ मुझसे कह ? किसका बेटा है तू ? और क्या तेरा नाम है ? तब वह बोला-सेठजी ! मेरा नाम विक्रम है. मैं आज तुम्हारे पास आयाहूं मेरे दिलका मकसद यह है कि, मैं राजासे मुलाकात करूं सो आज मुलाकात न हुई कल मैं राजासे मि लूंगा और उनकी सेवा करूंगा. जो वो मुझे नौकर रक्खेंगे और

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · Page 45 of 190 · BharatKosha