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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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पांचवी पुतली ५. ( ४३ )

मेरा महीना कर देंगे तो मैं रहूंगा. यह बात सुनकर वह महा- जन बोला-तुम क्या रोज लोगे ? तब राजा कहने लगा. जो कोई लाख रुपये रोज देगा तो हम उसके यहां नौकर रहेंगे. तब वह बोला-भाई ! तुम क्या काम करतेहो ? जो तुम्हें लाख रुपये रोजको कोई देवे वह काम मुझे बताओ ? तब उसने कहा-जिस राजाके पास मैं रहताहू उसकी गाड़ी मुश्किलमें काम आताहूं. सेठ हँसकर बोला, लाख रुपये रोज हमसे लो और कठिनतामें हमारे सहाय हो सुबह हुए नौकर रक्खा और दूसरे दिन लाख रुपये दिये. उसने उनमेंसे आधे रुपये भगवानके नाम संकल्प कर ब्राह्मणोंको दिये, आधेके आधे कंगालोंको दिये. और जो बाकी रहे उनका खाना पकवाकर भूखोंको खिला दिया. रातहुए पर फिर जो एक फकीरने सवाल किया उसेभी खङ्ग रेहन रखकर और भोजन पेटभर करवाया और आप चने चबाकर गुजरान की कितनेएक दिन उस साहूकारके पास रहकर रुपये हररोज योंही खर्च करते रहे. गरज किस्म- तने तो यारी की तब जोर बोला-अब मेरी बारी है, कि, एकाएक सेठके दिलको कुछ उचाटी हुई और एक जहाज तैयार कर किसी देशमें जानेका उसने इरादा किया और विक्रमसे कहा-मैं किसी देश जाताहूं. वह बोला-स्वामी मैंने यह बचन दियाथा कि, गाढ़ी भीड़में तुम्हारे काम आऊंगा. अब मैं तुम्हारे