सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
by पारम्परिक / लल्लू जी लाल
Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)
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Read in context( २ ) सिंहासनबत्तीसी.
कारीगर, सुनार, लुहार, सावकार, कसेरा, पटुआ, किनारी, बाफ, कौफतरार, जिलाकार, आईनासाज अपने अपने काममें सरगर्म थे. जौहरीबाजारमें जवाहरोंसे थैलियां भरी हुई मोती, मूँगा, जमुरूद लाल, याकूत, नीलम, पुखराज, जौहरी देखते भालतेथे और खरीद्दारोंसे बाजारका बाजार भराहुआ और उसके बराबर दूकानोंमें मेवाफरोश विलायती अनार, सेव, बिही, नाशपाती, अँगूरसे पिटारे पिटारियां भरकर लगाए हुए और बेर, छुहारे, पिस्ते, बादामोंके किये हुए बेच रहे. फूलवाले फूल गूँथ रहे. तंबोली बीड़े बाँधरहे. गंधियोंकी दूकानें तेल, फुलेल, इत्र अरगजेकी लपटोंसे महक रहीं. और सुपारीवाले दूकानोंमें पूड़े सुपारीके बाँधकर लगाए हुए डब्बे माझमोंके आगे धरे सुपारियां कतर रहे. बिसांती हर रंगकी चीजें दूकानोंमें चुने हुये मोल शाहतौस कर रहे. चौक चौकोर बनाहुआ मीना बाजार लगा हुआ, तीसरे पहरकी गुदरी लगी हुई असबाब तरह तरहका नया पुराना बेंचनेवाले बेंचरहे और माल लेनेवाले मोल ले रहे. गर्म बाजारी हरएक चीजकी होरही, कटीर हर तरफ बाजारहे. कहीं नाच, कहीं राग, कहीं गम्मत, कहीं नकल, कहीं किस्सा होरहा. मअशूक बाजारमे सैर करते हुए आशिक पीछे पीछे फिरते हुए दिन रात यह समान वहां रहताथा. बाग बगीचे सैर और