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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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सिंहासनबत्तीसी. ( ३ ) तमाशेके बने हुए, दरख्त मेवोंसे झूमते हुए, और फूल क्यारि- योंमें खिले हुए. तालाबोंमें कमल फूले हुए. बावलियोंमें पानी झलकता हुआ, हर एक कुएंपर रहट परोहा चलता हुआ, पनघट लगा हुआ और राजाके चौरासी खास महल ऊँचे ऊँचे दरवाजे खुशकितअ चार दीवारियां सीधी खींची हुई, चारोंतरफ उनके बाहर अंदर मकान अनूठे अनूठे बने हुए. कोठरियां दालान, दर दालान बारहदरियां भालाखाने चौमहिले पंचमहिले रंग- महल ऐशमहल अगारियां बंगले तयार चिलमने परदे हर एक दरवाजेपर लगे हुए, फर्श चांदनी सोजनी कालीनोंका जा- बजा बिछा हुआ, मसनद तकिये लगे हुए, शहनशनोंमें डंगल और कुर्सियां सोने रुपेकी जड़ाऊ बिछी हुई. ताखों पर शीशे बेदमश्क गुलाबने चुनेहुए सायबान ताराबाद लेके खिचे हुए, ननगीरे बाजी जगह अपने अपने नौकेपर खडे हुए, सहनमें क्यारियां बनीहुई, चौपड़की नहरें पानीसे भरीहुईं लहरें लेतीं, हौज बेदमश्क गुलाबसे भरे हुए, फुहारे छूटते हुए चादरोंसे पानी बहता हुआ, आबजोए चारोंतरफ जारी सर्ख खड़े हुए और छोटे छोटे दरख्त लगे हुए, राबिश पहिया सब दुरुस्त फूल हजारों रंगके क्यारियोंमें फूले हुए, हर एक महलमें एक एक ऐसा और कामगनी राजाका दिल हाथों लिये रहतीथीं. नाच, राग, रंग, रातदिन होताथा और वह