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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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र्गाने प्रकट होके उससे कहा कि-यह भूपाल कौन है? वह बोली कि-यह राजा विक्रम है इसने मेरी सेवा की है. और मैंने इससे वचन हारा है अगर मेरी मोहब्बत तेरे दिलमें हो तो अन्नपूर्णा इसे दे. तब हंसकर उसने राजाको एक थैली दी. और कहा कि-इसमेंसे जितनी खानेकी चीज तुम मागोगे उतनी पाओगे. तब राजाने हाथ फैला लेली. और वहांसे खग हो नदीके किनारे आन स्नान ध्यान कर निश्चिन्त हुआ कि इतनेमें एक ब्राह्मण वहां आन पहुंचा. उसको राजाने पास बुलाया और कहा कि-कुछ भोजन करोगे? उसने कहा-मुझे भूख लगी है, जो आप देओगे तो मैं खाऊंगा! राजा बोला-क्या खाओगे? किस चीजपर तुम्हारी रूरत है? तब ब्राह्मण बोला-इस वखत मिले तो पकवान खाऊंगा. राजा अपने मनमें सोचने लगा:- जो इसदम पकवान न पहुँचेगा तो मैं ब्राह्मणसे झूठा हूगा. इतनी बात मनमें बिचार थैलीमें हाथ डालकर जो निकाला तो देखा कि पकवानही निकला. ब्राह्मणने पेट भरकर खाया और बोला-महाराज! भोजन तो मैं किया, अब इसकी दक्षि- णाभी दीजिये. तब राजाने कहा-महाराज! आप जो दक्षिणा मांगोगे सो मैं दूंगा, ब्राह्मण बोला-यह थैली मैं दक्षिणा पाऊ तो आनंदसे अपने घर जाऊं थैली ब्राह्मणको देकर राजा अपने महलमें आया. इतनी कथा कहकर वह राजा भोजसे

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