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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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आठवी पुतली ८. ( ५७ ) फिर बोली कि-इतनी मेहनतसे थैली पाई और ब्राह्मणको देनेमें बार न लगाई. ऐसा साहसी और ऐसा दानी जो तू हो तो इस सिंहासनपर बैठ और नहीं तो पातक होगा. वहभी मुहूर्त राजाका टल गया जब दूसरे दिन फिर राजा सिंहासनपर बैठनेको आया, तब पुष्पावती - आठवीं पुतली- बोली-हे राजा भोज ! तूने जो सिंहासनपर बैठनेका चित्त किया है सो इसकी आशा मनसे छोडदे. राजा बोला-मैं किसतरह छोड़ं? तब पुतलीने कथा शुरू की कि, एक दिन राजा बीर विक्रमा- दित्य अपने दरबारमे बैठाथा उसवखत सब राजा मुजरेको हाजिर थे. इतनेमें एक बढई ने आकर सलाम किया और कहा, महाराज ! मैं आपके दर्शनको आयाहूं और एक घोड़ा आपके लिये लाया हूं. राजाने आज्ञा की कि-ले आ. बढ़ईने जो हिकमतका घोडा बनाया था सो नजर किया. राजाने घोडेको देख उससे पूंछा-कि, इसमे क्या २ गुण हैं ? बढ़ईने कहा-महाराज ! इसमें ये गुण हैं कि, न यह कुछ खाता है. न कुछ पीता है. और जहां चाहो तहां ले जाता है. दर्याई घोडेके बराबर है. घोडा इस वख्त चालाकीसे एक जगह