सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
by पारम्परिक / लल्लू जी लाल
Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)
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Read in contextदशवीं पुतली १०. ( ६७ ) और बंदरके गलेमें मोतीकी माला नहीं शोभती और गधे- पर पाखर नहीं फबती, इसवास्ते मेरा कहा तू मान और इस ख्यालसे दर गुजर, नहीं तो नाहक किसीदिन मेरा प्राण जायगा. यह बात सुनकर राजा चुप रहा और वह दिनभी गुजर गया. जब रात हुई अंदेश कर सुबहको बदस्तूर सिंहा- सनके पास आया और चाहा कि, पाँव धरें, तब मेगावती- दशवीं पुतली- हँसकर बोली-हे राजा भोज ! पहले तुम मुझसे यह बात सुनलो. पीछे इस सिंहासनपर बैठो तब राजा बोला, तू कथा कह मेरा जीभी सुननेको चाहता है. राजा वहां आसन बिछाय बैठ गया. और पुतली कहने लगी-सुन राजा ! एकदिन वसंतऋतुमें टेसू फुला हुआथा. मोर मोराया हुआ कोयल कूक रहीथी. हवा चल रहीं थी. राजा वीर विक्रमादित्य अपने बागमें बैठा हुआ हिंडोल झूलताथा. इतनेमें एक वियोगी किसी देशसे भूला भटका आ निकला. राजाके पांवपर गिरपड़ा और कहने लगा कि,-स्वामी मैंने बहुत दुःख पाया और अब मैं आपकी शरण आया हूं, और उसकी सूरत बनगई थी कि तमाम लोहू बदनका सूख गया था और आँखसे कम