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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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( ६८ ) सिंहासनबत्तीसी. सूझताथा, अन्नपाणी सब छोड दियाथा. किसी तरह धीरज नहीं धरता था. राजा ज्यों ज्यों समझाता था त्यों त्यों वह विरहसे व्याकुल हो हो रोता था. तब राजाने कहा-तू अपने जीको सँभाल और इतना दुःखी क्यो है ? और अब जो यहां आया है तो अपनी कथा कह दे कि, किसकारण ऐसी गति हुई है; और किसके गमसे तेरा यह शकल बन गई है ? तू किस देशसे आया है और क्या तेरा नाम है ? वह एक आह सर्द दिल पुर दर्दसे खैंचकर बोला-नगर कलंजर देश है मेरा. मैं मतिहीन ओर दुर्बुद्धि हूं. एक यतीने मेरे आगे यह बात कहीथी कि, एक खूब सूरत स्त्री एक जगह है, वैसी सुंदरी कोई जगहमें नहीं ! गोया कामदेवसे पैदा हुई है. बल्कि तीनों लोकोंमें वैसी न होगी. और लाखों राजा जी लगा उसके यहा आते हैं और जल जल जाते हैं पर, उसे नहीं पाते. राजाने पूछा-किसलिये ये जलते हैं. तब वह हकीकत कहने लगा कि-उसके बापने वहां एक आग भड़काई है, और एक कड़ाह भर घी चढ़ाकर रक्खा है. वह घी बडा खौलता है और यह उसकी शर्त है कि, जो उस कड़ाहमें स्नानकर जीता बच निकले उससे अपनी कन्याकी सादी करूंगा. यह बात उस योगीसे सुनकर मैंभी वहां गया था सो मैने अपनी आँखोंसे, वह तमाशा देख हैरान हुआ और वहां हजारों राजा देश देशके लाखों नौकर, चाकर, साथ लेकर