सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
by पारम्परिक / लल्लू जी लाल
Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)
Page 72 of 190
Read in contextदसवीं पुतली १०. (६९)
आते हैं और यह देख पछताकर जाते हैं. उनमेंसे जो इरादः कर्ता है सो उस कड़ाहमें गिरकर भुन जाता है. जब शक्ल उस राजकन्याकी नजर आई तब सुध बुध मैंने गँवाय अपनी हालत यह उसके इश्कमें बनाई है. यह बात उसके मुखसे सुनकर राजाने कहा-आज तुम यहांही रहो. कल तुम हम मिलकर वहा चलेंगे और उसे तुम्हे दिला देंगे. अपनी खातिर जमा रक्खो यह राजाकी बात सुन उसको समाधान हुआ. यह देख राजाने उसे स्नान करवा कुछ खिलाय अपनी सभामें बैठाकर यह हुकुम किया कि जितने संगीतविद्यावाले हैं सो सब तैयार हो हो आज यहां आकर हाजिर होवें और अपना अपना मुजरा बतलावें. राजाकी यह आज्ञा पायके सब आन हाजिर हुए. और अपना अपना गुण जाहिर करने लगे. राजाने उससे कहा कि-इनमेंसे जिस रंडीको तुम चाहो उस हम तुम्हें देंगे. तुम यहां बैठकर सुख भोग करो और उसका ख्याल दिलसे भुलदो. यह बात राजाकी सुनकर वह वियोगी बोला- महाराज ! सिंह अगर सात दिन उपवास करै तौभी घास न चरे. सिवाय उसके मुझे किसी औरकी इच्छा नहीं. इसी तरह तमाम रात बीत गई. जब सुबह हुवा तब राजाने स्नान पूजा कर उन बीरोंको याद किया. वे तुर्तही आन हाजिर हुआ. और अर्ज किया कि, महाराज ! हमको क्या हुकुम है ? हम