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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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ग्यारहवीं पुतली ११. ( ७३ ) इस सिंहासनपर पांव दे. एक दिन राजा वीरविक्रमादित्य उज्जैन नाम नगरीको गया और अपने सब आदमियोंको बिदा कर आप वहां रातको रहा. सोता था, कि, उत्तर दिशाकी ओरसे एक रंडी हाय मार उठी और पुकार पुकार कहने लगी कि-कोई ऐसा है कि, मेरी आकर खबर ले. इस पापीसे मुझे बचावे और जीवनदान दे. दममें मरी मरी पुकार करती थी और दम चुप हो जाती थी. उसकी आवाज सुनकर राजा चौंक पड़ा. और ढाल तरवार हाथमें ले अँधेरी रातमें अकेला उठ चला. किसीको खबर न हुई. जब वनमें राजा पैठा वह सुंदरी फिर रो रो पुकार उठी, इतनेमें राजा वहां जा पहुँचा. और देखा कि वहां एक देव उस स्त्रीसे रति माँगता है और वह नहीं मानती. तब शिरके बाल पकड़ पकड़कर जमीनपर दे दे पटकता है तब राजाने कहा--अबे पापी ! तू इस स्त्रीको क्यों मारता है ? नरकसभी नहीं डरता ? राजाकी बात सुनकर फिर वह उसे मारने लगा. राजाने कहा- तू इसे छोड़दे नहीं तो अभी मैं तुझे मारताहूं. यह राजा विक्रमका वचन सुनकर वह सन्मुख होगया और गुस्सेसे घोरकर बोला--या तू भाग, नहीं तो मैं तुझे खाताहूं ? और तू कौन है ? जो यहां आकर बात करता है ? तब राजाने गजबमें आकर एक तलवार ऐसी मारी कि. शिर उसका

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