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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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( ७४ ) सिंहासनबत्तीसी.

धडसे जुदा होगया, रुड मुंडमे दो वीर निकले और राजाके दोनों हाथोंमें लिपट गये तब राजाने धीरज धर छल बलकर उनमेंसे एकको मारा, दूसरा रैन भर लडता रहा और भोर होतेही भाग गया, दैत्य जब भाग गया तब उस रंडीसे राजाने कहा-अब तू जल्दी मेरे साथ चल और कुछ जीमें अंदेसा मत कर, वह राक्षस मेरे डरसे भाग गया, फिर न आवेगा. तब वह सुंदरी बोली कि—सुनो भूपाल ! जो मैं सात द्वीप नौखंड पृथ्वीमें जहा भागकर छिप रहूंगी उससे बचने न पाऊँगी. वह आकर ले जायगा. उसके बिना मेरे जिंदगी न होगी. उसके पास एक मोहनी पुतली है वह उसके पेटमें रहती है. जहां मै छिपूंगी उसके बलसे वह ढूंढ निकालेगा. और उस पुतलीमें यह ताकत है कि, एक देव मरनेसे दूसरे चार देव बना सकती है, यह बात उसकी सुनकर राजा उसी बनमें छिपा रहा. रात होते वह देव आया उस औरतसे फिर ख्वाहिस करने लगा. जब उसने न माना और बाल शिरके पकड जमीनपर पकड़ने लगा तब वह धाड़ करने लगी. उसकी आवाज सुनतेही राजा निकट आया और उससे लड़नेको तैयार हुवा तब देवभी रंडीको छोड़ राजाके सामने होगया. चाहे कि, राजाको मारैं. इतनेमें राजाने ऐसा एक खांडा मारा कि, धडसे शिर अलग होगया. उसके धडसे वह मोहनी निकली और अमृत लेने

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