सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
by पारम्परिक / लल्लू जी लाल
Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)
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Read in contextतेरहवीं पुतली १३. (८९)
द्रव्य अभीष्ट होगा उतना यह बटुआ देगा, और इसमेंसे कभी कम न होगा, पुनि बैतालने कहा-राजा ! मैं एक मोहनी तिलक तुझे देताहूं इसे जब तू घिसकर टीका देगा, तब सब तुझे दबेंगे तेरे सामने कोई न होगा. ये दोनोंने प्रसाद राजाको दिया. उसने करओटकर लिया और बोला कि-सुन बैताल ! तू इस मुर्देको छोडदे और मेरे घोडेको खा, यह मुर्दा योगीके हवाले करदे; क्योंकि तू भूखा न रहे और उसका कामभी बंद न होय यह सुनतेही बैताल उस घोड़ेको खागया और योगी मुर्दा ले अपना मंत्र साधने लगा. राजा वीरोंको बुलाय उनपर सवार हो अपने देशको चला. रास्तेमें एक भिकारी सन्मुख चला आताथा, उसने देखा कि, शकबँधी राजा आता है, डरते डरते उसने सवाल किया कि-महाराज ! आपके नगरमें मैं बहुत दिन रहा लेकिन कुछभी अर्थ मेरा सिद्ध न हुवा. अब मैं कुछ तुमसे माँगता हूँ, मेरे तईं दीजिये. यह सुनतेही राजाने वह बटुआ उसके हाथ दिया और उसका भेद बताया. वह अशीस दे अपने घरको गया और राजाभी अपने मंदिरमें आया. इतनी बात कह त्रिलोचनी. पुतली बोली-सुन राजा भोज ! ऐसा दानी और ऐसा साहसी जो होगा सोही इस सिंहासनपर बैठे; नहीं तो पातक है. उसके दूसरे दिनराजा सबेर उठ स्नान ध्यानकर दरबारमें आन बैठा. और दीवान मुत्सद्दियोंको बुलाकर कहा-