BharatKosha
सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

Page 92 of 190

Read in context
Page 92

( ९० ) सिंहासनबत्तीसी. कि-आज मेरा चित्त बहुत प्रसन्न है. जल्दी चलकर सिंहासन- पर बैठूंगा. इतनी बात कह वहांसे उठ सिंहासनके पास आ- कर गोदान कर ब्राह्मणको वृत्ति कर दी. फिर गणेशको मना सिंहासनपर बैठनेको पाव बढ़ाया इतनेमें त्रिलोचना नामक-

चौदहवीं पुतली-

बोली-हे राजा भोज ! पहिले कथा सुन जो मैं कहतीहूं पीछे सिंहासनपर बैठ. यह बात राजाने सुनतेही पांव खैंच लिया. और सिंहासनके नीचे आसन बिछाया बैठगया. तब पुतली बोली कि-राजा ! सुन एक- दिन राजा बीर विक्रमादित्यने अपने प्रधानको बु- लाकर कहा कि-मैं यज्ञ करूंगा जिसमें पुण्य हो और आगेका निस्तार होवे. दीवानने सुनते ही देशदेशको नौता भेजा जहां तलक राजा प्रजा थे उन्हें बुलाया. कर्नाटक, गुज- रात, काश्मीर, कन्नोज, तिलंगान इन नगरोंको भी नौता भेज जितने ब्राह्मण थे उन्हें बुलाया और सातों द्वीपोंको नौता भेजा वहांके राजाओंको तलब किया. फिर एक बीराको पाता- लके राजाके पास नौता 'भेज उसे बुलाया और दूसरे बीराको