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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट

Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished190 pages

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९४ स्पन्दकारिका भी है। इस प्रकाश-विमर्शमय १संघट्ट को शास्त्रीय शब्दों में आनन्द-शक्ति कहते हैं। विश्ववैचित्र्य के अनन्त रूपों में स्पन्दित होना इस आनन्दशक्ति का अकाट्य स्वभाव है। फलतः यह एक प्रसिद्ध शैवमान्यता है कि संवित् प्रतिसमय उच्छलनात्मक है। यह विशुद्ध प्रकाशरूपा संवित्, विशेष-स्पंदों के रूप में प्रवहमान होने की दशा में, इसी उच्छलनात्मक स्वभाव के कारण, स्वरूप में ही अवस्थित २वेद्यभाग को स्वरूप से अलग करके, स्वयं आकाशतुल्य ३शून्यातिशून्य रूप में अवस्थित रहती है। इसका तात्पर्य यह कि इस दशा में अवस्थित होकर, एक ओर अपने से ही अलग किये हुए वेद्यभाग का पूर्ण निषेध करके, उसको अपनाने के प्रति विमुख हो जाती है, दूसरी ओर उसका, इस प्रकार की निषेधात्मक विमुखता को अपनाना ही, असीमता को भूलकर ससीमता के क्षेत्र में पहला पदार्पण है। परिणामतः इतने अंश में इसकी पूर्णता भी खण्डित हो जाती है। इसके इसी रूप को शैवशब्दों में 'आकाशकल्प शून्यातिशून्य' कहते हैं क्योंकि यह रूप न तो पूर्ण ही है और न अपूर्ण ही। अस्तु, यह (संवित्) इस प्रकार की शून्यातिशून्य भूमिका पर उतर कर ही, स्वरूप से पृथक् किये हुए ४वेद्य अंश को, उत्तरो- त्तर स्थूल रूपों में विकसित करने के प्रति उन्मुख हो जाती है और इस प्रक्रिया को कार्यान्वित करती हुई, सर्वप्रथम, उसी पूर्वोक्त विश्वप्राणना के रूप में उच्छलित हो जाती है। फलतः विश्वप्राणना के रूप को धारण करना ही, स्पन्दशक्ति का सर्वप्रथम बहिर्मुखीन निःष्यन्द है। इसको शास्त्रीय शब्दों में 'प्राण-स्पन्द' कहते हैं। विश्वप्राणना आगे-आगे प्रवहमान होती हुई, पांच स्थूल प्राणों का रूप धारण करती है। कहना ५न होगा कि ये पाँच प्राण, किसी भी प्रकार की पाञ्चभौतिक काया में प्रविष्ट होकर, उसको इस प्रकार से नचाते रहते हैं कि जड़ होने पर भी वह एक पूर्ण चेतन-पिंड जैसा ही दिखाई देती है। प्राण-स्पन्द के अनन्तर फिर यह स्पन्दशक्ति किन-किन रूपों में प्रवहमान रहती है इसकी कोई गणना नहीं है। सत्त्व, रजस् और तमस् इन तीन गुणों; मनस्, बुद्धि और अहंकार इन तीन अन्तः- करणों; इनके द्वारा वेद्य सुखिता, दुःखिता और मूढता इन तीन अन्त.करण विषयों; पाँच ज्ञानेन्द्रियों, पाँच कर्मेन्द्रियों, सारे घट-पट आदि वेद्यविषयों अर्थात् आब्रह्मस्तम्बपर्यन्त समूचे १. तयोर्यद्यामलं रूपं स संघट्ट इति स्मृतः । आनन्दशक्तिः सैवोक्ता यतो विश्वं विसृज्यते ॥ (त०, ३.६८) २. संविन्मात्रं हि यच्छुद्धं प्रकाशपरमार्थ कम् । तदेव शून्यरूपत्वं संविदः परिगीयते ॥ ३. यही वह शून्यदशा है जिसको प्रसिद्ध शून्यवादी बौद्ध-आचार्य नागार्जुन सर्वोत्कृष्ट दशा मानते हैं । ४. स एव स्वात्मा मेयेऽस्मिन् भेदिते स्वीक्रियोन्मुखः । पतत्समुच्छलत्वेन प्राणस्पन्दोर्मिसंज्ञितः ॥ (तं०, ६.११) ५. सा प्राणवृत्तिः प्रसरन्ती रूपैः पञ्चभिरात्मसात् । देहं यत्कुरुते संवित् पूर्णस्तेनैष भासते ॥ (तं०, ६.१४)