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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट

Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished190 pages

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अज्ञानी और विशेष स्पन्द ९५ प्रमेय विश्व के अनन्त भावों के रूपों में, प्रतिसमय प्रवहमान रहती है। प्रस्तुत सूत्र में उल्लिखित स्पन्द-निःष्यन्दों से इन्हीं विशेष स्पन्द-प्रवाहों का अभिप्राय है। अनुभवी सिद्ध पुरुषों का कथन है कि इन विशेष-स्पन्दों का गोरखधन्धा पग-पग पर इतनी उलझनों से भरा हुआ है कि संसार का सारा पशुवर्ग इसमें फंसकर दिग्भ्रम में पड़ा हुआ है ! सही दिशा किस ओर है यह किसी को सूझता नहीं है। इसके प्रतिकूल सुप्रबुद्ध-भूमिका पर पहुँचे हुए योगियों की बात ही निराली है। उनको, सद्-गुरुओं की कृपा से, तुर्यरूप शाक्तभूमिका का समावेश हुआ होता है। अतः उनको विशेष-स्पन्दों की अनेकाकारता में भी सामान्य-स्पन्दात्मक एकाकारता की ही अखण्ड अनुभूति प्रतिसमय होती रहती है। ऐसी परिस्थिति में, विशेषस्पन्दों के अनन्त रूपों में प्रवहमान शाङ्कर-शक्तियाँ ही, उसको अन्तिम शिवधाम पर पहुँचाने में सहायिकायें बन जाती हैं ॥१९॥ [अज्ञानी और विशेष स्पन्द] अगले सूत्र में यह बात समझाई जा रही है कि ये पूर्वोक्त विशेष-स्पन्द, प्रतिक्षण, अप्रबुद्ध पशुओं के अन्तस् में विद्यमान चिन्मात्रता पर आवरण डालने में व्यस्त रहते हैं :- अप्रबुद्धधियस्त्वेते स्वस्थितिस्थगनोद्यताः । पातयन्ति दुरुत्तारे घोरे संसारवर्त्मनि ॥२०॥ स्वल्पप्रबोधांस्तु स्वस्थितेः चिद्रूपायाः स्थगनं कृत्वा, ते गुणाः पातयन्ति दुरुत्तारे अस्मिन् विषमे संसारवर्त्मनि, यतस्तदात्मकमेव नित्यमात्मानं पश्यन्ति, न तु शुद्धबुद्ध- स्वरूपतया ॥२०॥ अनुवाद सूत्र-(गुणादिरूपों में प्रवहमान विशेष-स्पन्दों की यह एक अचूक विशेषता है कि) ये प्रतिसमय, स्वरूप की वास्तविक स्थिति (चिन्मात्रता) पर, आवरण डालने पर कटिबद्ध रहते हैं। फलतः ये २अप्रबुद्ध बुद्धिवाले पशुओं को, अत्यन्त कठिनाई से पार किये जाने के योग्य और अत्यन्त भयावह संसार के रास्ते पर लगाकर, दिग्भ्रम में डाल देते हैं ॥२०॥ वृत्ति-ये गुण अर्थात् गुणादि रूपों में प्रवहमान विशेष-स्पन्द, परिमित ज्ञान वाले पशुओं की वास्तविक चिद्रूपता पर आवरण डालकर, उनको अत्यन्त कठिनता से पार किये जाने के योग्य, संसार के ऊबड़-खाबड़ मार्ग पर लगा कर पथभ्रष्ट कर देते हैं। इसका कारण यह कि वे (अज्ञानी पशु), स्वरूप को प्रतिसमय उन गुणादि विशेष-स्पन्दों के रूप में ही देखते रहते हैं। वे, उसको (स्वरूप को) शुद्ध अर्थात् गुणत्रय से जनित सुखिता, दुःखिता और मूढ़ता की उपाधियों की कलुषता से रहित और बुद्ध अर्थात् अपरिमित बोध के रूप में अनुभव नहीं कर सकते हैं ॥२०॥ १ द्रष्टव्य-मा० वि०, ३.३३. २. ऐसे प्रमाता जिनकी बुद्धि पर से अभी अज्ञान की काई हटी न हो।