स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट
Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)
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Read in context१४४ स्पन्दकारिका साधारण रूप में संसारी 'पशु' ज्ञेयविषयों के १ दकोटि और अन्तकोटिवाले रूप से परिचित नहीं होते हैं, क्योंकि उनको स्वरूप-परिचय ही नहीं होता है। ऊपर से वे उनके मध्यकोटिवाले स्थूल एवं परिवर्तनशील रूप को ही उनका वास्तविक रूप समझ कर प्रमाद में पड़े रहते हैं। यही एक महती विडम्बना है। अतः सूत्रकार ने उपरिनिर्दिष्ट 'प्रबुद्धः' और 'सर्वदा' शब्दों का प्रयोग करके सम्यक् ज्ञानदृष्टि से युक्त योगियों को, साक्षात्कार की तीनों कोटियों पर ज्ञेयविषयों के वास्तविक स्वरूप को ही दृष्टि में रखने का उपदेश दिया है। इसके अतिरिक्त सूत्र में उस उपाय को भी समझाया गया है जिसको अपनाने से योगीजन प्रत्येक प्रकार की अनुभवदशा में केवल स्वरूपाभास पर ही अवस्थित रहने की क्षमता प्राप्त कर लेते हैं। वह उपाय है—'अपने सद्दिमर्श के द्वारा प्रत्येक ज्ञेयविषय का स्वरूपविश्लेषण करके उसके वास्तविक रूप को पहचानना'। उदाहरण के तौर पर यदि 'घट' का स्वरूपविश्लेषण किया जाये, तो यह समझने में देर नहीं लगती कि स्थूल आकार, ऊँचाई, गोलाई, ललाई इत्यादि इसका वास्तविक स्वरूप नहीं बन सकते हैं, क्योंकि ये सारे कल्पित, परिवर्तनशील और नश्वर हैं। फलतः इन सबों को काटकर शेष जो कुछ बचता है, वह इसका संवेदनात्मक रूप है जो कि 'चित्कला की अहंविमर्शमयी स्पन्दना के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। इसी प्रकार, स्वरूप-विश्लेषणात्मक पद्धति का अभ्यास करनेवाले योगी को किसी समय स्वयं ही यह अनुभूति हो जाती है कि सारा विश्व वास्तव में स्वरूपस्पन्दना ही है। भगवान् २आशुतोष ने इसी सिद्धान्त को अपनी सूत्रात्मक भाषा में इस प्रकार समझाया है— "सावधान योगी, प्रत्येक अनुभवदशा में अन्यथा उपपत्तिरूप अज्ञानात्मक ज्ञान का अन्न खाते रहते हैं।" इसका भाव यह कि योगी लोग प्रत्येक भाव पर चढ़ी हुई, तथाकथित प्रमेयता की कालिमा को, स्वरूप-विश्लेषणात्मक अनुसन्धान की मसकली से घिस-घिस कर, उसके वास्तविक निर्मल स्वरूप का साक्षात्कार करके ही दम लेते हैं। फिर उनके लिये तथाकथित जन्म-मरण अथवा सांसारिक द्वन्द्वात्मकता का कोई भी बखेड़ा ३अवशिष्ट नहीं रहता है ॥४४॥ १. चिता सिद्धं यत्तु न तदचिदिति वक्तुं समुचितम् । तयासिद्धं नाचिन्नचिदपि कदाचित् क्वचिदपि ॥ चितो द्वारैः सिद्धं यदपि च समस्तं तदपि चित् । (भा० प्रथम भाग, ४१२ पृष्ठ) २. ज्ञानमन्नम् । (शिवसूत्र, २.९) ३. मृत्युञ्च कालञ्च कलाकलापं विकारजालं प्रतिपत्तिसात्म्यम् । ऐकात्म्यनानात्म्यवितर्कजातं तदा स सर्वं कवलीकरोति ॥ (अर्धशिखा शिवमन्त्र, १.६ में उदाहृत)