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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट

Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished190 pages

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ब्राह्मी आदि शक्तियाँ १४५ [ ब्राह्मी आदि शक्तियाँ ] पूर्वसूत्र में कहा गया कि जागरूक योगियों को 'दूसरा' पीड़ा नहीं पहुँचा सकता है। अतः अगले सूत्र में इसी रहस्य का उद्घाटन किया जा रहा है कि पीड़ा पहुँचानेवाला वह दूसरा कौन है और वह किस प्रकार पीड़ा पहुँचाता है ? :- शब्दराशिसमुत्थस्य शक्तिवर्गस्य भोग्यताम् । कलाविलुप्तविभवो गतः सन् स पशुः स्मृतः ॥४५॥ शब्दराशिरकारादिक्षकारान्तः तत्समुद्भूतस्य कादिवर्गात्मकस्य ब्राह्म्यादि- शक्तिसमूहस्य; भोग्यतां गतः पुरुषो, ब्राह्म्यादीनां कलाभिः ककाराद्यक्षरैर्विलुप्तविभवः स्वस्वभावात् प्रच्यवितः पशुरुच्यते ॥४५॥ अनुवाद सूत्र—(ज्ञानी लोगों ने) शब्दराशि से उद्भूत शक्तिवर्ग की वश्यता में पड़े हुए (स्वतन्त्र) पतिप्रमाता को ही पशुप्रमाता का नाम दिया है। (उसके वश्यता में पड़ने का कारण यह है कि) कला समूह ने उसके असीम वैभव (स्वातन्त्र्य) को पूर्णतया नष्ट-भ्रष्ट कर दिया है ॥४५॥ वृत्ति—'अकार' से लेकर 'क्षकार' तक के वर्णसमुदाय को शब्दराशि कहते हैं। पुरुष (स्वतन्त्र पतिप्रमाता) उसी शब्दराशि से उद्भूत और 'कवर्ग' इत्यादि वर्गों का रूप धारण करनेवाली ब्राह्मी इत्यादि (पशु) शक्तियों के समुदाय का वशवर्ती बना है। इस अवस्था में उसको 'पशु' कहते हैं, क्योंकि इन्हीं ब्राह्मी इत्यादि शक्तियों के साथ सम्बन्धित कलाओं ने अर्थात् 'ककार' इत्यादि स्थूल अक्षर समुदाय ने उसके विभव को नष्ट-भ्रष्ट किया है अर्थात् उसको स्वभाव से च्युत किया है ॥४५॥ विवरण तांत्रिक शैवदर्शन का यह एक प्रसिद्ध सिद्धान्त है कि पतिप्रमाता की अभिन्न एवं स्पन्दमयी विमर्शशक्ति (सर्वस्वतन्त्र संवित् शक्ति) ही भेदरूप बहिर्विमर्श की अवस्था में, वैखरी वाणी के द्वारा उच्चार्यमाण स्थूल वर्णसमुदाय के रूप में प्रसृत होती है। यह वर्ण- समुदाय वस्तुतः शक्तिरूप होने के कारण पदों, वाक्यों, बड़े-बड़े ग्रन्थों या संसार के सारे आदान-प्रदानों की बातों का रूप धारण करके विकल्प कल्पनाओं का एक ऐसा अंडबंड जंजाल उत्पन्न कर देता है कि स्वयं स्वतन्त्र पतिप्रमाता हो उसमें उलझ-पुलझ कर अस्वतन्त्र पशुप्रमाता बन जाता है। वर्ण चूं कि शक्तिरूप ही हैं, अतः हलचल को जन्म देना उनका स्वभाव है। वे अच्छी या बुरी जैसी भी हलचल उत्पन्न करें, पशु तदनुसार कार्य करने के लिये मजबूर होता है। प्रतिक्षण बातों के बतंगड़ बनते रहते हैं, विकल्पों की श्रृंखलायें उलझती रहती हैं और संसारभाव में पड़ा हुआ पशुवर्ग अशान्ति की भट्ठी में घुसता जा रहा है। १ Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal

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