स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट
Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)
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Read in context१४६ स्पन्दकारिका सूत्र में इसी सिद्धान्त का उल्लेख सूत्रात्मक शब्दों में किया गया है कि—'कलासमूह ने स्वतन्त्र की स्वतन्त्रता को मटियामेट कर रखा है।' शास्त्रीय शब्दों में 'क' से लेकर 'ह' तक के सारे सस्वर व्यञ्जनसमुदाय को कलासमूह कहते हैं । फलतः कलासमूह ही वह 'दूसरा' है जो असावधान पशुप्रमाता को पग-पग पर शतशः बाधाओं में डाल देता है । इस सम्बन्ध में, स्थूल शब्दराशि के रूप में, विमर्शशक्ति की बहिर्मुखीन प्रसारप्रक्रिया की अतीव गम्भीर और दुरूह सैद्धान्तिक विवेचना आगम-शास्त्रों में प्रस्तुत की गई है। उसका विस्तृत एवं सर्वाङ्गीण वर्णन करना यहाँ पर संभव नहीं है, क्योंकि ऐसा करने से प्रस्तुत विषय के दुरूह और अरुचिकर बन जाने की आशंका है। अतः पाठकों का ध्यान इस ओर आकर्षित करने के लिए निम्नलिखित पंक्तियों में कई प्रमुख बातों का आंशिक रूप में उल्लेख किया जा रहा है । 'अकार' से लेकर 'क्षकार' तक के वर्णसमुदाय को 'शब्दराशि' कहते हैं । इसका शास्त्रीय नाम१ 'मातृका' है । वास्तव में मातृकाशक्ति, सारी भेदपूर्ण वाचक और वाच्यरूप स्थूल शब्दराशि को अपने गर्भ में, अभेदरूप में अर्थात् केवल स्पन्दनामय २विमर्श रूप में, धारण करनेवाली पराशक्ति ही है। इसका रूप पूर्ण३ अहन्तारूप स्वातन्त्र्य के अतिरिक्त और कुछ नहीं है । स्वतन्त्र चेतनारूप होने के कारण यह स्वयं 'अ' से 'क्ष' तक के ४स्थूल एवं सूक्ष्म वर्णसमुदाय के रूप में प्रसृत होकर, अनन्त प्रकार के वाचकों और वाच्यों के विश्व को अव- भासित कर लेती है । फलतः यह सारे विश्व की माता तो है, परन्तु ऐसी माता है जिसका परिचय सिद्ध पुरुषों के अतिरिक्त और किसी को नहीं है । न जानी ५हुई माता को ही 'मातृका' कहते हैं । दूसरी ओर कई आचार्यों ने इस शब्द को मातृकावाचक के स्थान पर परिवारवाचक मानकर, इसकी दूसरी प्रकार की व्याख्या भी प्रस्तुत की है— 'अ' से 'क्ष' तक की स्थूल शब्दराशि सर्वस्वतन्त्र चित्शक्ति का ही बहिर्मुखीन प्रसार है। भेद-पदवी पर उतरते ही यह शब्दराशि आठ वर्गों में बँट जाती है और शक्ति स्वयं भी १. मालिनीविजयोत्तर तन्त्र में शब्दराशि का 'न' से लेकर 'फ' तक का दूसरा क्रम भी प्रस्तुत किया गया है। इसको 'मालिनी' कहते हैं। भट्टकल्लट को शायद वर्णमाला का यह क्रम मान्य नहीं रहा होगा, क्योंकि उसने अपनी वृत्ति में मातृका-क्रम (अ से क्ष तक) का ही उल्लेख किया है। २. सा हि भगवती अशेषवाच्यवाचकात्मकजगदभेदचमत्कारात्मकशब्दराशिविमर्शपरमार्था.... ........॥ (स्व० तं०, ११.१९९) ३. स्वातन्त्र्यशक्तिरेवास्य सनातनी पूर्णाहन्तारूपा । (स्प० नि०, ३.१३) ४. 'स्थूल' से व्यक्त ध्वनिरूप और 'सूक्ष्म' से अव्यक्त ध्वनिरूप अर्थात् क्रमशः मुख से बोले जानेवाले और मन में चिन्त्यमान वर्णों का अभिप्राय है। वैखरीरूप और मध्यमारूप होने के कारण दोनों व्यक्त पदवी पर ही अवस्थित हैं । ५. अज्ञाता माता मातृका विश्वजननी । (शिवसूत्रविमर्शिनी, १.४)