स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट
Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)
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Read in context१५० स्पन्दकारिका CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri ३. १अघोरा (परा)—अनुभूतिशील एवं सात्त्विक प्रकृतिवाले योगियों के लिये शक्तिवर्ग का रूप अघोर अर्थात् अतीव सौम्य एवं कल्याणकारी है। जिस प्रकार यह राजसिक या तामसिक प्रकृतिवाले व्यक्तियों को तदनुकूल कर्मफलों की ओर प्रेरित करती हैं उसी प्रकार योगियों को शिवभाव पर पहुँचा देती हैं। अब सूत्र में उल्लिखित 'कलासमूह' के विषय में भी दो शब्द कह देना आवश्यक है। अन्तर्विमर्श की अवस्था में अ, इ, उ, ऋ, लृ—ये पाँच मूल-स्वर क्रमशः चित्, निर्वृत्ति, इच्छा, ज्ञान और क्रिया—इन पाँच माहेश्वर शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। २बहिर्विमर्श की अवस्था में इन्हीं पाँच मूल स्वरों की अवतारणा क्रमशः कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग, पवर्ग के रूप में होती है। इन्हीं ककार आदि अक्षरों को पारिभाषिक शब्दों में 'कलासमूह' कहते हैं क्योंकि ये कलातत्त्व, विद्यातत्त्व इत्यादि मायीय प्रपञ्च का प्रतिनिधित्व करते हैं। शास्त्रों में कलासमूह की परिगणना स्वरवर्ग को अलग छोड़कर 'क' वर्ण से आरम्भ करने का अभिप्राय यह है कि जब स्वर और व्यंजन पारस्परिक संमिश्रण की अवस्था में पड़ जाते हैं तभी विकल्प परम्पराओं का क्षोभ उत्पन्न हो जाता है, अन्यथा केवल स्वर या केवल व्यंजन अलग अलग किसी क्षोभ को उत्पन्न नहीं कर सकते हैं। इन दोनों के पारस्परिक संमिश्रण को शास्त्रीय शब्दों में बीजयोनि-संक्षोभ कहते हैं। इस सारे प्रसङ्ग का निष्कर्ष यही निकलता है कि प्रत्येक शब्द केवल एक जड़ ध्वनि- मात्र ही नहीं, अपितु स्पन्दमयी चेतना शक्ति है। प्रत्येक जीव तबतक इस शक्ति का दास है जबतक उसे अपने भोक्तृभाव की अनुभूति प्राप्त न हो ।।४५।। [ शक्ति का अवरोह और आवरणात्मक स्वभाव और क्रियाशक्ति के दो रूप ] अगले तीन सूत्रों में इस तथ्य का स्पष्टीकरण किया जा रहा है कि स्वतन्त्र आत्मा में पूर्वोक्त स्वशक्ति-अज्ञान 'प्रत्ययोद्भव' के रूप में प्रकट हो जाता है। 'प्रत्ययोद्भव' ही त्रिविध मल है। इसी से शिव, शिवभाव से अवतीर्ण होकर, जड़ भाव की अन्तिम कोटि पृथिवीतत्त्व तक पहुँच जाता है— परामृतरसापायस्तस्य यः प्रत्ययोद्भवः । तेनास्वतन्त्रतामेति स च तन्मात्रगोचरः ॥४६॥ परामृतरसात् स्वरूपात् अपायः प्रच्युतिः, तस्य यः प्रत्ययोद्भवो विषयदर्शने स्मरणोदयो यतः, तेन पुरुषोऽस्वतन्त्रताम् असर्वगत्वं च प्राप्नोति, स च प्रत्ययः तन्मात्र- गोचरो रूपाद्यभिलाषात्मकः ॥४६॥ १. पूर्ववज्जन्तुजातस्य शिवधामफलप्रदाः । पराः प्रकथितास्तज्जैरघोराः शिवशक्तयः ।। (तत्रैव, ३.३३) २. बहिर्विमर्शेन तु कादिमान्तं पञ्चपञ्चकं अ, इ, उ, ऋ, लृ शक्तिभ्यः पुरुषतत्त्वं समस्तं प्रपञ्चयति । (शिवसूत्रवि०, ३.७)