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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट

Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished190 pages

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शक्ति और क्रियाशक्ति १५१ स्वरूपावरणे चास्य शक्तयः सततोत्थिताः । यतः शब्दानुवेधेन न विना प्रत्ययोद्भवः ॥४७॥ स्वरूपस्य स्वभावस्याच्छादने चास्य पुरुषस्य शक्तयो ब्राह्म्याद्याः पूर्वमुक्ता याः, ताः सततम् उद्युक्ताः । यतः शब्दरहितस्य प्रत्ययस्य ज्ञानस्य नास्त्येव कस्यचि- दुद्भवः ॥४७॥ सेयं क्रियात्मिका शक्तिः शिवस्य पशुवर्तिनी । बन्धयित्री स्वमार्गस्था ज्ञाता सिद्ध्युपपादिका ॥४८॥ सा चेयं क्रियास्वभावा भगवतः पशुवर्तिनी शक्तिः । यदुक्तम्— 'न सा जीवकला काचित् सन्तानद्वयवर्तिनी । व्याप्त्री शिवकला यस्यामधिष्ठात्री न विद्यते ॥' इति । सैव च बन्धकारणम् अज्ञाता, ज्ञाता सा च पुनः परापरसिद्धिप्रदा भवति पुंसाम् ॥४८॥ अनुवाद सूत्र—(निर्विकल्प स्वरूप में) १विकल्प ज्ञानों का उदित होना ही, उसका परामृतरस (शिवशक्ति सामरस्य) की पदवी से लुढ़क जाना है। इसी से वह अस्वतन्त्र बन जाता है। इसके (विकल्प ज्ञान के) विषय पांच २तन्मात्र हैं ॥४६॥ वृत्ति—वह (स्वतन्त्र पतिप्रमाता) परा मृत रस की पदवी से लुढ़क जाता है क्योंकि उसमें प्रत्ययोद्भव अर्थात् ग्राह्य विषयों की उपलब्धि होने पर तद्विषयक ३स्मरण का उदय हो जाता है। उससे वह पुरुष परतन्त्रता और असर्वव्यापकता की अवस्था पर पहुँच जाता है। प्रत्ययोद्भव के विषय तन्मात्र हैं। रूप इत्यादि के प्रति अभिलाषा का उत्पन्न होना, उस विषयता का स्वरूप है ॥४६॥ सूत्र—यह निश्चित है कि पूर्वोक्त शक्तियाँ (ब्राह्मी इत्यादि शक्तियाँ) इसके स्वरूप पर आवरण डालने के लिये प्रतिसमय उद्यत रहती हैं। इसका कारण यह कि (स्थूल और सूक्ष्म) शब्दों की अनुस्यूतता के बिना 'प्रत्ययोद्भव' संभव नहीं है ॥४७॥ वृत्ति—पहले जिन ब्राह्मी इत्यादि शक्तियों का उल्लेख किया गया है वे इस पुरुष के स्वरूप अर्थात् स्वभाव को ढापने के लिये प्रतिसमय उद्यत रहती हैं। इसका कारण यह कि शब्द १. सूत्र में उल्लिखित 'प्रत्ययोद्भव' एक पारिभाषिक शब्द है। स्वशक्ति विरोध के फल- स्वरूपविकल्पहीन स्वरूप में ज्ञेय विषयों से सम्बन्धित विकल्प ज्ञानों का उदय हो जाने को 'प्रत्ययोद्भव' कहते हैं। २. यहाँ पर 'तन्मात्र' शब्द से सारी प्राधानिक सृष्टि का अभिप्राय है। ३. यहाँ पर 'स्मरण' से स्मरण, संशय, भ्रम, अध्यवसाय, अनुमान इत्यादि विकल्प ज्ञानों की परम्परा का अभिप्राय है।