स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट
Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)
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Read in contextशक्ति और क्रियाशक्ति १५५ CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri सूत्र ४८- इस सूत्र में क्रियाशक्ति के दो रूपों का उल्लेख किया गया है-(१) शिववर्तिनी क्रिया- शक्ति और (२) पशुवर्तिनी स्थूल-क्रिया। इनमें से पशुवर्तिनी क्रिया बन्धन में डाल देनेवाली है और इसी को शास्त्रीय शब्दों में 'कार्म-मल' कहते हैं। इस कथन का आशय निम्नलिखित विचारों को ध्यान में रखने से स्पष्ट हो सकता है- शिव में जिस प्रकार ज्ञातृता है उसी प्रकार कर्तृता भी है। यह कहना ठीक होगा कि वास्तव में उसकी स्वतन्त्र इच्छा ही उसकी ज्ञातृता और कर्तृता भी है। अस्तु, शिवसम्बन्धिनी कर्तृता को 'शिववर्तिनी क्रियाशक्ति' कहते हैं। विमर्शनमयी स्पन्दना ही इसका मात्र स्वरूप है। दूसरे शब्दों में इसको पारमेश्वरी निर्माण^१ शक्ति भी कहते हैं, क्योंकि यही वह शाक्तस्पन्दना है, जो^२ मूर्तिभेद से जनित देशक्रम और क्रियाभेद से जनित कालक्रम से उपलक्षित, अनन्त प्रकार के शून्य, प्राण, पुर्यष्टक इत्यादि प्रमाताओं और उनके नील, सुख आदि ज्ञेयविषयों को स्वरूप से और एक दूसरे से भेदरूप में अवभासित करती है। इस प्रकार अनन्त वैचित्र्यों से परिपूर्ण विश्व का अवभासन ही, ईश्वर की 'निर्माणशक्ति' अथवा 'क्रियाशक्ति' है। यह ^३निर्माण भगवान् की स्वतन्त्र इच्छा से ही यथावत् रूप में निष्पन्न हो जाता है और इसमें उसको किसी भी प्रकार के उपादान-सम्भार की अपेक्षा नहीं रहती है। वह ऐसी क्रिया का स्वयं ही स्वतन्त्र कर्ता है, क्योंकि वह ऐसे निर्माण को स्वयं जानता भी है। उसका ज्ञाता के रूप में स्फुरित होना ही स्वतः ^४क्रिया भी है। शिववर्तिनी क्रियाशक्ति का कोई क्रम नहीं है क्योंकि इस अवस्था पर इसका वास्त- विक रूप-'मैं ^५स्फुरित हो जाऊँ; मैं घूर्णित हो जाऊँ', इस प्रकार के देश-कालक्रम से हीन 'अहंरूप इच्छास्पन्द' के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। १. किन्तु निर्माणशक्तिः साप्येवं विदुष ईशितुः । तथा विज्ञातृविज्ञेयभेदो यदवभास्यते ॥ (ई० प्र०, २.१.८) २. स्वरूपभेदेन देशक्रमकारिणा क्रियाभेदेन च कालक्रमसंपादकेन उपलक्षितो यो विज्ञातुः शून्यादेः प्रमातुः भेदोऽन्योन्यं ज्ञेयाच्च, एवं घटादेः परस्परं ज्ञातुश्च स भगवता अवभास्यते, यत् तदवभासनं सा ईशितुरपि निर्माणशक्तिः क्रियाशक्तिः । (ई० प्र० वि०, २.१.८) ३. इच्छयैव भुवनानि भावयन् यः प्रियोपकरणग्रहोऽपि सन् । अप्रियोपकरणग्रहोऽभवत्तं स्वशक्तिसचिवं शिवं स्तुमः ।। (स्तु० कु०, १.१५) ४. यतश्च तन्निर्मितं ज्ञातृज्ञेयक्रियावैचित्र्यभेदम् असौ विद्वान् वेत्ति अविरतं तत्रैव हि तत् स्फुरति ततोऽपि तस्य सा क्रियाशक्तिः । (ई० प्र० वि०, २.१.८) ५. ईश्वरस्यापि 'ईशे, भासे, स्फुरामि, घूर्णे, प्रत्यवमृशामि', इत्येवंरूपं यदिच्छात्मकं विमर्शनम् 'अहम्' इत्येतावन्मात्रतत्त्वं, न तत्र कश्चित् क्रमः । (तत्रैव) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal