स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट
Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)
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Read in context१५६ स्पन्दकारिका "चिन्मात्र भगवान् की स्वतन्त्र इच्छात्मक स्फुरणा ही सारे विश्व की स्फुरणा है; स्वरूप की विमर्शना अर्थात् निजरूप की आनन्दमयता का आस्वाद लेना ही विश्व का आम- र्शन है और अपने चिदानन्दरस की पूर्णता के कारण हिलकोरें लेना ही सारे भावमण्डल का उल्लसित होना है'। अभी ऊपर कहा गया कि शिववर्तिनी क्रियाशक्ति का स्वरूप विमर्शात्मक स्पन्दना है। इस विषय में यह समझना आवश्यक है कि विमर्श के साथ अभिलापात्मकता का साहचर्य एक शाश्वत यथार्थ है। फलतः पारमेश्वर विमर्श के साथ भी अभिलापात्मकता अवश्य है परन्तु उस भूमिका पर वह भी तद्रूप ही है। भाव यह कि उस पदवी पर 'अ' से 'क्ष' तक के ध्वनि- समुदाय का रूप भी 'अहंविमर्श' ही है, जिसको शास्त्रीय शब्दों में 'अव्यक्त-परावाणी' कहते हैं। बाह्यप्रसार की प्रक्रिया में यह उपर्युक्त शिववर्तिनी और क्रमहीन क्रियाशक्ति ही पशुवर्तिनी स्थूल एवं सक्रम क्रिया का रूप धारण कर लेती है। पारमेश्वरी २क्रियाशक्ति स्वतन्त्र चेतनाशक्ति है, अतः अपने सामर्थ्य से अपने को ही, पशुभूमिका पर सक्रम स्थूल क्रिया के रूप में विकसित कर लेती है और अपने अक्रमस्वरूप पर सक्रम क्रियात्मक उपराग भी धारण करती है। स्वतन्त्र इच्छा तो स्वतन्त्र इच्छा है; जो कुछ भी करना चाहे कर लेती है। वास्तव में पशुभूमिका पर भी प्रत्येक क्रिया का मूलरूप इच्छात्मक-स्पन्दना ही है, परन्तु यह स्पन्दना मानसिक संकल्प-विकल्प के रूप में होती है। यदि ३सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाये तो संसार के किसी भी प्राणी के हृदय में जो आन्तरिक इच्छा होती है वही बाह्य रूप में उसकी क्रिया होती है। जबतक यह मानसिक संवेदन के रूप में अवस्थित रहती है तबतक इसमें कोई क्रम नहीं होता है, क्योंकि वहां तक कहीं विच्छेद नहीं पड़ता है। ज्यों ही यह ४इच्छात्मक स्पन्दना, पाञ्चभौतिक काया के द्वारा, बाह्य स्थूल-क्रिया के रूप में उदित होती है त्यों ही इस पर कालक्रम और तद्द्वारा देशक्रम का रंग चढ़ता है और परिणामतः अक्रम क्रियाशक्ति ही सक्रम स्थूलक्रिया बनती है। उदाहरणार्थ नाना प्रकार की पकाने, लिखने या पढ़ने इत्यादि क्रियाओं की मूलरूप इच्छात्मक-स्पन्दना में कोई तद्रूप क्रम नहीं होता है, परन्तु १. स्फारयत्यखिलमात्मना स्फुरन्विश्वमामृशसि रूपमामृशन् । यत्स्वयं निजरसेन घूर्णसे तत्समुल्लसति भावमण्डलम् ॥ (शिवस्तो०; १३.१५) २. अस्य क्रियाशक्तिः 'क्रमरूपक्रियानिर्माणसामर्थ्यं, क्रमरूपक्रियोपरागयोगश्च' इति । (ई० प्र० वि०, २.१ ८) ३. चैत्रमैत्रादेरपि पचामि इति यैव अन्तरिच्छा सैव क्रिया, तथा च अधिश्रयणादिबहुतर- स्पन्दनसम्बन्धेऽपि पचामि इति नास्य विच्छिद्यते । यत्तु इच्छारूपं तदेव तथास्पन्दात्म- तया भाति । तत्र तु न कोऽपि क्रमः तत्त्वतः । (तत्रैव) ४. इच्छारूपं 'पचामि' इति स्पन्दनात्मतां कार्यपर्यन्तां गतं क्रमारूषितम् आभाति । (ई० प्र० वि०, २.१.८)